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अब रिश्वत लेने व देने के ठोस सबूत होने पर ही माना जाएगा भ्रष्टाचार : सुप्रीमकोर्ट

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि भ्रष्टाचार तभी माना जाएगा, जब रिश्वत की मांग या लेनदेन के ठोस सबूत मौजूद होंगे। महज शक्ति के दुरुपयोग का आरोप लगाकर किसी अधिकारी को भ्रष्टाचार का दोषी नहीं ठहराया जा सकता। मामला एक फिशिंग ठेकेदार से जुड़ा था, जिसमें एक सरकारी अधिकारी पर बिना टेंडर जारी किए करोड़ों का नुकसान करने का आरोप लगाया था। इसके तहत प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह मामला 27 फरवरी को खारिज कर दिया है।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अगर कोई अधिकारी सरकारी नीति से भटककर कार्य करता है, तो केवल इस आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि उसने रिश्वत ली है। जब तक यह साबित नहीं हो जाता कि रिश्वत की मांग और उसे स्वीकार किया गया था, तब तक भ्रष्टाचार का अनुमान नहीं लगाया जा सकता है। प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट की धारा 20 के मुताबिक यदि कोई पब्लिक सर्वेंट अनुचित लाभ स्वीकार करता है, तो यह माना जाएगा कि उसने किसी कार्य को प्रभावित करने के लिए ऐसा किया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब तक यह साबित न हो कि रिश्वत की मांग की गई और उसे स्वीकार किया गया, तब तक केवल अनुमान के आधार पर उसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

इस मामले में अधिकारी पहले हाईकोर्ट गए थे, लेकिन वहां से राहत नहीं मिली। हाईकोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद अधिकारी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया जहां कोर्ट ने अवैध लाभ की ठोस मांग और स्वीकार्यता के अभाव में मामले को खारिज कर दिया। कोर्ट के इस फैसले से अथॉरिटी के दुरुपयोग और भ्रष्टाचार के बीच स्पष्ट अंतर स्थापित हो गया है। अब रिश्वत की मांग और स्वीकार्यता का प्रमाण जरूरी होगा, केवल शक्ति के दुरुपयोग के आधार पर भ्रष्टाचार का मुकदमा नहीं चलाया जा सकेगा। सिर्फ प्रशासनिक गलतियों को भ्रष्टाचार नहीं माना जाएगा। अधिकारियों पर लगाए जाने वाले आरोपों की जांच में अब अधिक सबूतों की जरूरत होगी। सजा केवल तभी मिलेगी जब रिश्वत लेने या देने के पुख्ता सबूत होंगे।

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