इलाहाबाद हाई कोर्ट का आदेश: हिंद चैरिटेबल ट्रस्ट के खातों से मनमानी निकासी पर रोक
डॉ. अमोद सचान और ऋचा मिश्रा के वित्तीय अधिकारों पर कड़ा पहरा

निश्चय टाइम्स न्यूज डेस्क
इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने हिंद चैरिटेबल ट्रस्ट के प्रबंधन को लेकर चल रहे विवाद में एक बड़ा अंतरिम आदेश जारी करते हुए ट्रस्ट, उससे संचालित अस्पताल और मेडिकल कॉलेज के बैंक खातों से मनमानी निकासी पर रोक लगा दी है। अदालत के इस आदेश के बाद अब ट्रस्ट के खातों का संचालन डॉ. अमोद कुमार सचान और प्रतिवादी ऋचा मिश्रा अकेले या संयुक्त रूप से नहीं कर सकेंगे।
न्यायमूर्ति जसप्रीत सिंह ने डॉ. अमोद कुमार सचान की ओर से दाखिल याचिका को मंजूर करते हुए यह व्यवस्था दी है। कोर्ट के नए निर्देशों के मुताबिक, अब खातों का संचालन डॉ. सचान और संस्थापक ट्रस्टी विक्रम सिंह संयुक्त रूप से करेंगे। अदालत ने स्पष्ट किया है कि इस अंतरिम व्यवस्था का उद्देश्य ट्रस्ट के संस्थानों का कामकाज सुचारू रखना और वित्तीय पारदर्शिता व जवाबदेही सुनिश्चित करना है।
वित्तीय लेन-देन पर कड़ी शर्तें कोर्ट के आदेश के अनुसार, खातों से निकाली जाने वाली धनराशि का उपयोग केवल बेहद जरूरी कार्यों के लिए ही किया जा सकेगा। इसमें कर्मचारियों, स्टाफ और डॉक्टरों के वेतन, बैंकों या वित्तीय संस्थानों की नियमित देनदारियों, बिजली-पानी के बिल, कर (टैक्स) और अन्य वैधानिक भुगतानों को ही शामिल किया गया है। इसके अलावा, प्रत्येक निकासी या भुगतान का पूरा विवरण, उसकी प्रकृति और उद्देश्य अपीलीय अदालत के समक्ष अनिवार्य रूप से प्रस्तुत करना होगा। यह व्यवस्था अपीलीय अदालत के नए आदेश आने तक प्रभावी रहेगी।
विवाद की पृष्ठभूमि और कोर्ट की तल्ख टिप्पणियां यह पूरा मामला ट्रस्ट के चेयरमैन पद को लेकर डॉ. अमोद सचान और अन्य ट्रस्टियों के बीच लंबे समय से चल रहे वर्चस्व की लड़ाई का परिणाम है। डॉ. सचान ने इस विवाद को लेकर सिविल जज (सीनियर डिवीजन), लखनऊ की अदालत में घोषणा और स्थायी निषेधाज्ञा के लिए वाद दाखिल किया था। बीते 2 अप्रैल को सिविल जज ने अंतरिम निषेधाज्ञा जारी कर प्रतिवादियों को डॉ. सचान के चेयरमैन के रूप में कार्य करने में हस्तक्षेप करने से रोक दिया था।
हालांकि, इस आदेश के खिलाफ दाखिल अपीलों को अपर जिला जज/विशेष न्यायाधीश (एनआइए), लखनऊ ने 8 जुलाई को स्वीकार करते हुए निचली अदालत की अंतरिम निषेधाज्ञा को निरस्त कर दिया था। अब हाई कोर्ट ने अपर जिला जज के उस आदेश को खारिज करते हुए दोनों अपीलों को नए सिरे से सुनवाई के लिए वापस भेज दिया है। अपीलीय अदालत को निर्देश दिया गया है कि वह 9 सितंबर को दोनों पक्षों को सुनकर प्राथमिकता के आधार पर आगामी तीन सप्ताह के भीतर अपना निर्णय सुनाए। कोर्ट ने यह भी कहा कि अंतरिम निषेधाज्ञा देने का अधिकार दोनों पक्षों के दावों के गुण-दोष की गहन समीक्षा के बाद ही तय किया जाएगा।
डॉ. अमोद सचान की कार्यशैली और प्रबंधन पर खड़े हुए सवाल इस पूरे कानूनी घटनाक्रम ने डॉ. अमोद कुमार सचान की कार्यशैली और ट्रस्ट के प्रबंधन पर गंभीर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। ट्रस्ट जैसे सार्वजनिक और संवेदनशील संस्थानों, जहां अस्पताल और मेडिकल कॉलेज संचालित होते हैं, वहां चेयरमैन पद को लेकर इस स्तर की आंतरिक खींचतान और वित्तीय मनमानी के आरोप सीधे तौर पर संस्थान की साख को धूमिल करते हैं।
कानूनी जानकारों और विरोधियों का मानना है कि डॉ. सचान द्वारा लगातार बढ़ाए जा रहे कानूनी विवाद और पदों की खींचतान ने न केवल प्रशासनिक व्यवस्था को पटरी से उतारा है, बल्कि संस्थानों के वित्तीय नियंत्रण को भी कटघरे में ला खड़ा किया है। हाई कोर्ट द्वारा खातों के संचालन पर रोक लगाकर सह-संचालन की व्यवस्था देना और हर एक पाई के हिसाब-किताब की अनिवार्यता तय करना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि संस्थान के भीतर वित्तीय अनुशासनहीनता और मनमानी के गंभीर अंदेशे थे। एक शैक्षणिक और चिकित्सा संस्थान के मुखिया पर इस प्रकार के नियंत्रण का कसा जाना उनके प्रशासनिक और प्रबंधकीय कौशल पर एक बड़ा नकारात्मक धब्बा है, जिससे संस्थान के भविष्य और कर्मचारियों के हितों पर भी अनिश्चितता के बादल मंडराने लगे हैं।



