विपक्ष पर बरसीं, सरकार पर नरमी: मंदिर घोटालों पर मायावती का दोहरा रवैया, क्या यह भाजपा को वॉकओवर है?

निश्चय टाइम्स न्यूज डेस्क
देश के सबसे बड़े धार्मिक स्थलों—अयोध्या और बद्रीनाथ धाम—में चढ़ावे की चोरी और गबन के आरोपों पर बसपा प्रमुख मायावती का ताजा रुख उनकी राजनीतिक मजबूरी और भाजपा के प्रति परोक्ष झुकाव को उजागर कर रहा है। करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़े इस संवेदनशील मुद्दे पर सीधे डबल-इंजन सरकार की जवाबदेही तय करने के बजाय, मायावती का पूरा जोर विपक्ष को ही कटघरे में खड़ा करने पर रहा। राजनीतिक गलियारों में इस बात की तीखी चर्चा है कि मायावती का यह बयान दरअसल भाजपा सरकार को इस महाघोटाले की नैतिक जिम्मेदारी से बचाने की एक सोची-समझी ढाल है।
जांच के नाम पर सिर्फ औपचारिकता? निचले स्तर के कर्मचारियों पर ठीकरा फोड़ शीर्ष को बचाने की कोशिश
मायावती ने अपने बयान में बद्रीनाथ और राम मंदिर के मुख्य प्रबंधकों की जांच की मांग तो की, लेकिन उनका यह सुर बेहद ढीला और रक्षात्मक नजर आया। उन्होंने इसे “निचले स्तर की गड़बड़ी या लापरवाही” का रूप देकर सीधे तौर पर प्रशासनिक तंत्र और सत्तासीन सरकार को क्लीन चिट देने की कोशिश की है। जब सरकारी संरक्षण के बिना इतने बड़े धार्मिक ट्रस्टों में वित्तीय हेराफेरी मुमकिन ही नहीं है, तब मायावती का केवल ‘एसआईटी’ (SIT) जांच के भरोसे बैठ जाना और सरकार को सीधे तौर पर न घेरना, भाजपा के प्रति उनके “सॉफ्ट कॉर्नर” और चुनावी डर को साफ बयां करता है।
विपक्ष को ही बना दिया विलेन: जनहित के मुद्दों की आड़ में भाजपा की ‘बी-टीम’ का किरदार!
नैरेटिव तब और नकारात्मक हो जाता है जब मायावती मंदिर सुरक्षा के मुद्दे को छोड़कर सीधे सपा, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी (AAP) पर हमलावर हो जाती हैं। उन्होंने भाजपा सरकार से सवाल पूछने के बजाय उलटे विपक्ष से ही राम मंदिर घोटाले के ‘पुख्ता सबूत’ मांग डाले। मायावती के इस कदम को भाजपा के लिए एक बड़ी राहत के रूप में देखा जा रहा है। आलोचकों का साफ कहना है कि जनहित और आस्था के मुद्दों को दरकिनार कर मायावती केवल विपक्ष को ‘चुनावी अवसरवादी’ साबित करने में जुटी हैं, ताकि आगामी चुनावों में भाजपा विरोधी वोटों का बिखराव कर सत्तापक्ष को सीधा फायदा पहुंचाया जा सके।



