
निश्चय टाइम्स न्यूज डेस्क
देश की आर्थिक सेहत पर एक बार फिर सरकार और आंकड़ों के दावों पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। हाल ही में जारी वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (Q1) के जीडीपी अनुमानों ने आर्थिक जानकारों को भी चौंका दिया है। सरकार ने बेस ईयर बदलकर और डबल डिफ्लेशन जैसी जटिल तकनीकों का हवाला देकर विकास दर को चमकदार दिखाने की कोशिश की है, लेकिन इसके पीछे की कड़वी सच्चाई कुछ और ही है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) सेक्टर में कच्चे माल और लागत की कीमतें लगातार आसमान छू रही हैं, वहां जीडीपी डिफ्लेटर नकारात्मक (-1.5%) कैसे हो गया? क्या इसका मतलब यह है कि फैक्ट्रियों में चीजें सस्ती बिक रही हैं? बिल्कुल नहीं! इसका सच यह है कि सरकार की नीतियों के कारण इनपुट लागत (कच्चे माल का खर्च) उत्पादन मूल्य से कहीं अधिक तेजी से बढ़ी है। यही वजह है कि कागजों पर तो विकास दर बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर दी गई, लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त में उद्योग दबाव में हैं।
दूसरी ओर, पिछले साल के जीडीपी आंकड़ों में भारी-भरकम कटौती कर दी गई है। पुराने आंकड़ों को ₹86 लाख करोड़ से घटाकर अचानक ₹80 लाख करोड़ कर दिया गया। क्या यह सिर्फ एक तकनीकी संशोधन है या चालू वर्ष के विकास आंकड़ों को कृत्रिम रूप से बेहतर दिखाने का एक सुनियोजित हथकंडा? जानकारों का मानना है कि इस तरह के संशोधनों से तुलनात्मक आधार ही कमजोर हो जाता है, जिससे आम जनता को गुमराह किया जाता है।
इसके अलावा, जब खुदरा महंगाई (CPI) 3.9% और थोक महंगाई (WPI) 9% से ऊपर दौड़ रही है, तब जीडीपी डिफ्लेटर महज 2.5% कैसे रह गया? यह साफ दिखाता है कि सरकारी आंकड़े और आम आदमी की जेब का दर्द एक-दूसरे के विपरीत दिशा में चल रहे हैं। जीडीपी के उत्पादन और व्यय पक्ष (Production and Expenditure) के बीच का भारी अंतर यह चीख-चीख कर कह रहा है कि आने वाले दिनों में इन आंकड़ों में बड़े पैमाने पर उथल-पुथल और संशोधन होना तय है। जब तक आंकड़ों की बाजीगरी बंद नहीं होती, तब तक विकास के इन चमकदार कागजी विज्ञापनों पर भरोसा करना मुश्किल है।



