हिंदू-मुस्लिम और प्रवासी मुद्दों के बीच उलझा जनादेश, बिखरे वोटों का सीधा फायदा बीजेपी को
असम में फिर ध्रुवीकरण की राजनीति हावी, मत विभाजन ने तय की सत्ता की दिशा

निश्चय टाइम्स न्यूज डेस्क
असम के चुनावी नतीजों ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या लोकतंत्र में अब मुद्दों से ज्यादा पहचान और ध्रुवीकरण की राजनीति असर डाल रही है। ताजा रुझानों में भारतीय जनता पार्टी ने 82 सीटों पर बढ़त/जीत के साथ स्पष्ट बढ़त बनाई है, जबकि इंडियन नेशनल कांग्रेस महज 19 सीटों पर सिमटती नजर आई।
इस चुनाव में सबसे अहम कारक “मत विभाजन” रहा, जिसने पूरे परिणाम को प्रभावित किया। कांग्रेस, ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट और अन्य विपक्षी दलों के बीच वोटों का बंटवारा हुआ, जिसका सीधा लाभ बीजेपी को मिला। यदि विपक्षी वोट एकजुट होते, तो कई सीटों पर मुकाबला अलग दिशा ले सकता था।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, चुनावी अभियान के दौरान “हिंदू-मुस्लिम” और “अवैध प्रवासी” जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उभारा गया। इन संवेदनशील विषयों ने मतदाताओं को भावनात्मक रूप से प्रभावित किया और चुनावी माहौल को ध्रुवीकृत कर दिया। सवाल यह उठता है कि क्या यह रणनीति वास्तविक विकास मुद्दों से ध्यान हटाने का माध्यम बनी?
बीजेपी के साथ सहयोगी दल असम गण परिषद और बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे गठबंधन को मजबूती मिली। वहीं छोटे दल जैसे रायजोर दल और अन्य सीमित प्रभाव ही छोड़ सके।
चुनाव परिणाम यह भी दिखाते हैं कि विपक्ष की रणनीतिक कमजोरी और आपसी समन्वय की कमी ने सत्ता का रास्ता आसान कर दिया। कांग्रेस और अन्य दल न तो एकजुट रणनीति बना पाए और न ही प्रभावी नैरेटिव स्थापित कर सके।
कुल मिलाकर, असम का यह जनादेश सिर्फ जीत-हार का आंकड़ा नहीं, बल्कि यह संकेत है कि आधुनिक राजनीति में मतदाताओं का झुकाव किस तरह भावनात्मक और पहचान आधारित मुद्दों की ओर बढ़ रहा है। इससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया की गुणवत्ता और भविष्य पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।



