क्राइम

कानपुर-दिल्ली जैसे शहरों में दोषसिद्धि कम, आरोपियों के छूटने से पीड़िताओं का भरोसा डगमगाया

महिलाओं के खिलाफ अपराध मामलों में न्याय व्यवस्था पर सवाल, महानगरों में बरी होने वालों की संख्या चौंकाने वाली

निश्चय टाइम्स न्यूज डेस्क

देश के महानगरों में महिलाओं के खिलाफ अपराधों के मामलों में न्यायिक प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। वर्ष 2024 के आंकड़ों के अनुसार कई बड़े शहरों में दोषसिद्धि की तुलना में आरोपियों के बरी होने और मामलों से मुक्त होने की संख्या कहीं अधिक दर्ज की गई है। यह स्थिति न केवल जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न लगाती है, बल्कि पीड़ित महिलाओं के न्याय पर विश्वास को भी कमजोर करती दिखाई दे रही है।

राष्ट्रीय आंकड़ों के मुताबिक देश के 19 महानगरों में कुल 4558 लोगों को महिलाओं के खिलाफ अपराधों में दोषी ठहराया गया, जबकि 11991 आरोपी अदालतों से बरी हो गए। यह अंतर बेहद चिंताजनक माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि कमजोर विवेचना, सबूतों की कमी और लंबी न्यायिक प्रक्रिया के कारण कई गंभीर मामलों में आरोपी बच निकलते हैं।

दिल्ली में सबसे अधिक 723 दोषसिद्धियां दर्ज हुईं, लेकिन वहीं 1607 आरोपी बरी भी हुए। कानपुर में 1636 दोषसिद्धियां दर्ज होने के बावजूद न्याय व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं क्योंकि कई मामलों में कार्रवाई की गुणवत्ता पर बहस तेज हो गई है। लखनऊ में 151 लोगों को दोषी ठहराया गया, जबकि 205 आरोपी डिस्चार्ज कर दिए गए और एक भी आरोपी के बरी होने का आंकड़ा दर्ज नहीं हुआ, जिसने आंकड़ों की विश्वसनीयता पर नई बहस छेड़ दी है।

जयपुर, मुंबई, अहमदाबाद और हैदराबाद जैसे शहरों में भी बड़ी संख्या में आरोपी अदालतों से छूटते दिखाई दिए। सामाजिक संगठनों का कहना है कि यदि अपराधियों को सजा नहीं मिलेगी तो महिलाओं की सुरक्षा केवल सरकारी दावों तक सीमित रह जाएगी।

महिला सुरक्षा को लेकर बड़े-बड़े दावे करने वाली व्यवस्थाओं के बीच ये आंकड़े यह संकेत दे रहे हैं कि कानून का डर कमजोर पड़ता जा रहा है। विशेषज्ञों ने फास्ट ट्रैक कोर्ट, बेहतर फॉरेंसिक जांच और पीड़ित सहायता तंत्र को मजबूत करने की मांग की है ताकि महिलाओं को समय पर न्याय मिल सके।

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