आरबीआई का नया KCC निर्देश: कागजी दावों के बीच किसानों पर बढ़ा पाबंदियों और कागजी कार्रवाई का बोझ!

निश्चय टाइम्स न्यूज डेस्क
: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) योजना को लेकर नए ‘मास्टर डायरेक्शन 2026’ जारी कर दिए हैं। हालांकि बैंकिंग व्यवस्था इसे एक ‘सरल और कंपोजिट’ सुधार के रूप में पेश कर रही है, लेकिन धरातल पर यह नीति किसानों के लिए राहत कम और बैंकों की अंतहीन शर्तों और सख्त पाबंदियों का नया जाल ज्यादा नजर आ रही है। नया नियम जनवरी 2027 से लागू होने जा रहा है, जिसने अन्नदाताओं की चिंता बढ़ा दी है।
6 साल का कड़ा बंधन और नियमों की जटिलता
आरबीआई ने नए दिशानिर्देशों के तहत केसीसी सुविधा की अवधि 6 साल तय की है। अब किसानों के कर्ज को ‘कम्पोजिट मैक्सिमम परमिसिबल लिमिट’ (CMPL) के दायरे में बांध दिया गया है। जानकारों का मानना है कि इस सख्त सीमा के कारण आपात स्थिति या फसल बर्बाद होने पर किसानों को तत्काल अतिरिक्त वित्तीय मदद मिलना बेहद मुश्किल हो जाएगा।
फसल बीमा और तकनीकी खर्चों का थोपा गया बोझ
नए फॉर्मूले के तहत ड्राइंग लिमिट तय करने में फसल बीमा प्रीमियम, ड्रोन सर्वे, सॉफ़्टवेयर फीस और सैटेलाइट आधारित फसल निगरानी जैसे तकनीकी खर्चों को शामिल किया गया है।
आलोचकों का कहना है कि जहां आम किसान बुनियादी खाद-बीज के संकट से जूझ रहा है, वहां उस पर इन आधुनिक और खर्चीली सेवाओं का अतिरिक्त वित्तीय भार डालना व्यावहारिक नहीं है। बीमा प्रीमियम की अनिवार्य कटौती से किसानों के हाथ में आने वाली वास्तविक ऋण राशि और कम हो जाएगी।
बंटाईदारों और छोटे किसानों के लिए कागजी भूलभुलैया
हालांकि आरबीआई ने सीमांत किसानों के लिए 10,000 से 50,000 रुपये तक के ‘फ्लेक्सी केसीसी’ की बात कही है, लेकिन इसके लिए भूमि रिकॉर्ड, किरायेदारी प्रमाण पत्र और स्थानीय प्रशासन से सत्यापन की जो शर्तें रखी गई हैं, वे छोटे और अनपढ़ किसानों के लिए किसी दुःस्वप्न से कम नहीं हैं। बंटाईदारों और मौखिक पट्टेदारों के लिए हलफनामा और पंचायत प्रमाणपत्र जुटाना ग्रामीण भारत की कड़वी हकीकत में भ्रष्टाचार और शोषण का नया जरिया बन सकता है।
कड़े प्रूडेंशियल नॉर्म्स: डिफॉल्टर घोषित होने का बढ़ा खतरा
दिशानिर्देशों में साफ कहा गया है कि नए लोन पर कड़े प्रूडेंशियल नॉर्म्स (आय मान्यता और परिसंपत्ति वर्गीकरण) लागू होंगे। इसका सीधा मतलब यह है कि मौसम की बेरुखी या किसी अन्य कारण से यदि किसान समय पर भुगतान नहीं कर पाया, तो उसे तुरंत डिफॉल्टर की श्रेणी में डाल दिया जाएगा। अंतहीन ‘फील्ड निरीक्षण’ और निगरानी के नाम पर बैंकों का हस्तक्षेप किसानों की स्वायत्तता को सीधे प्रभावित करेगा।



