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भारतीय अर्थव्यवस्थी से पूंजी का रिकॉर्ड पलायन

भारतीय अर्थव्यवस्थी से पूंजी का रिकॉर्ड पलायन: जून में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश प्रतिबद्धता में 47% की भारी गिरावट

निश्चय टाइम्स न्यूज डेस्क

वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं और घरेलू बाजार में निवेशकों के डगमगाते भरोसे के बीच भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा जारी जून 2026 के ताजा आंकड़े देश के वित्तीय भविष्य पर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं। जून 2026 में भारत से बाहर होने वाले आउटवर्ड फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (OFDI) यानी कुल वित्तीय प्रतिबद्धता में सालाना आधार पर लगभग 47 प्रतिशत की भारी गिरावट दर्ज की गई है। जहां जून 2025 में भारतीय कंपनियों ने विदेशों में 5,742.22 मिलियन अमेरिकी डॉलर का भारी निवेश प्रतिबद्ध किया था, वहीं इस साल जून में यह आंकड़ा सिमटकर मात्र 2,990.73 मिलियन अमेरिकी डॉलर पर आ गया है।

इक्विटी निवेश में 66% की ऐतिहासिक गिरावट: विदेशी बाजार से पीछे हटती भारतीय कंपनियां आंकड़ों का सूक्ष्म विश्लेषण भारतीय उद्योग जगत के कमजोर होते कदमों की दर्दनाक तस्वीर पेश करता है। वास्तविक व्यापारिक विस्तार का सबसे अहम पैमाना माना जाने वाला ‘इक्विटी’ निवेश जून 2025 के 2,199.99 मिलियन डॉलर से घटकर जून 2026 में महज 738.32 मिलियन डॉलर रह गया। इक्विटी में आई यह 66% से अधिक की भारी गिरावट साफ इशारा करती है कि भारतीय कंपनियां वैश्विक स्तर पर अपने नए उपक्रमों या विनिर्माण इकाइयों को स्थापित करने से हाथ खींच रही हैं।

ऋण एवं वित्तीय गारंटियों में भी भारी संकुचन: नकदी संकट का संकेत गिरावट का यह सिलसिला केवल इक्विटी तक सीमित नहीं है, बल्कि कॉरपोरेट कर्ज (Loan) और दी जाने वाली गारंटियों (Guarantees) में भी भारी गिरावट देखी गई है। जून 2026 में जारी कॉरपोरेट ऋण घटकर 469.87 मिलियन डॉलर रह गया, जो मई 2026 (645.75 मिलियन डॉलर) की तुलना में भी काफी कम है। इसी प्रकार, वैश्विक परियोजनाओं के लिए जारी की जाने वाली गारंटियां भी सिमटकर 1,782.54 मिलियन डॉलर रह गईं। मई 2026 के 4,512.02 मिलियन डॉलर के मुकाबले केवल एक महीने में कुल वित्तीय प्रतिबद्धता में आई 33% की मासिक गिरावट देश के वित्तीय समावेशन और आर्थिक स्थिरता पर गंभीर चिंताएं पैदा करती है।

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