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जन औषधि योजना का कड़वा सच: सरकारी दावों के बीच जमीनी हकीकत पर उठते गंभीर सवाल

जन औषधि योजना का कड़वा सच: सरकारी दावों के बीच जमीनी हकीकत पर उठते गंभीर सवाल

निश्चय टाइम्स न्यूज डेस्क

नई दिल्ली, 24 जुलाई 2026। देश भर में सस्ती दवाओं का ढिंढोरा पीट रही प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना (PMBJP) अब बजटीय गड़बड़ियों, वितरण की सुस्ती और गुणवत्ता के संदेहों के घेरे में आ गई है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 30 जून 2026 तक 20,149 जन औषधि केंद्र (JAK) खोलने का दावा तो किया गया है, लेकिन योजना की अंदरूनी हकीकत मरीजों की उम्मीदों पर खरी उतरती नहीं दिख रही।

बजट कटौती और वित्तीय मोर्चे पर विफलता

सरकारी रिपोर्ट खुद इस योजना के वित्तीय संकट को उजागर करती है। वित्तीय वर्ष 2025-26 में जहां 353.50 करोड़ रुपये का बजट अनुमान रखा गया था, वहीं इसे घटाकर महज 190 करोड़ रुपये (संशोधित अनुमान) कर दिया गया। बजटीय आवंटन में यह भारी कटौती योजना के प्रति प्रशासनिक उदासीनता और वित्तीय कुप्रबंधन को साफ दर्शाती है।

दवाओं की उपलब्धता और आपूर्ति श्रृंखला ध्वस्त

कागजों पर 2,110 दवाइयों और 315 शल्य चिकित्सा उपकरणों की सूची तो तैयार की गई है, परंतु धरातल पर मरीजों को आवश्यक दवाइयों के लिए भटकना पड़ रहा है। पांच गोदामों और 42 वितरकों का ढांचा मांग के मुकाबले अपर्याप्त साबित हो रहा है, जिससे कई केंद्रों पर जरूरी जीवनरक्षक दवाइयां नदारद रहती हैं।

क्षेत्रीय असमानता और गुणवत्ता पर उठते सवाल

राज्यों के बीच वितरण का भारी असंतुलन चिंताजनक है। जहां उत्तर प्रदेश (4,226) और केरल (1,833) में केंद्रों की संख्या अधिक है, वहीं उत्तर-पूर्व और केंद्र शासित प्रदेशों में यह उपस्थिति नगण्य है। इसके अलावा, प्रयोगशाला जांच की जटिल प्रक्रियाओं के कारण दवाओं की निर्बाध उपलब्धता लगातार प्रभावित हो रही है।

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