धर्म

‘जो बोले सो निहाल’: सिखों के छठे गुरु हरगोबिंद साहिब जी का 431वां प्रकाश पर्व श्रद्धा और उल्लास के साथ

यहियागंज गुरुद्वारे में गूंजा

निश्चय टाइम्स न्यूज डेस्क

सुबह से रात तक उमड़ा संगतों का सैलाब! लखनऊ के ऐतिहासिक गुरुद्वारा श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी, यहियागंज में सिखों के छठे गुरु, ‘मीरी-पीरी के मालिक’ श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी का 431वां प्रकाश पर्व 30 जून को बेहद श्रद्धा और सत्कार के साथ मनाया गया। प्रातः 4:00 बजे से शुरू हुआ यह धार्मिक समागम देर रात तक चलता रहा, जिसमें पूरी राजधानी से हजारों की संख्या में संगतों ने माथा टेका।

दिल्ली के रागी जत्थे ने बिखेरा शबद-कीर्तन का रस

  • दिव्य कीर्तन: गुरुद्वारा सचिव मनमोहन सिंह हैप्पी ने बताया कि डॉ. गुरमीत सिंह के संयोजन में विशेष रूप से बंगला साहिब, दिल्ली से आए भाई साहिब सिंह जी के रागी जत्थे ने अपनी मधुर वाणी में शबद-कीर्तन कर संगतों को निहाल कर दिया।
  • अटूट लंगर: इस पावन अवसर पर गुरुद्वारे में सुबह से लेकर देर रात तक मिस्सी रोटी और ठंडी-मीठी लस्सी का विशेष लंगर लगातार वितरित किया गया।

संत-सिपाही परंपरा के जनक थे गुरु साहिब कथावाचक ज्ञानी गुरमीत सिंह जी ने गुरु साहिब के गौरवशाली जीवन पर प्रकाश डालते हुए बताया कि 19 जून 1595 को जन्मे गुरु हरगोबिंद साहिब जी ने मात्र 11 वर्ष की आयु में गुरुगद्दी संभाली थी। उन्होंने मुगल साम्राज्य के अत्याचारों के खिलाफ सिखों को एक पराक्रमी सेना के रूप में संगठित किया।

मीरी और पीरी: दो तलवारों का इतिहास अत्याचार के खिलाफ गुरु साहिब ने दो तलवारें धारण कीं—’पिरी’ (आध्यात्मिक शक्ति) और ‘मीरी’ (सैन्य शक्ति)। उन्होंने ही सिखों को ‘संत-सिपाही’ बनाया, अकाल तख्त का निर्माण कराया और बुनियादी मानवाधिकारों की रक्षा के लिए कई धर्मयुद्ध लड़े।

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