राजनीति

धार्मिक प्रतिबंध हटाने और जाति जनगणना की मांग से गरमाई सियासत, तुष्टिकरण के रास्ते पर बढ़ा संगठन

पसमांदा महाज़ की कार्यशाला में उठी टिकटों की राजनीति: गैर-राजनीतिक होने के दावों की खुली पोल

निश्चय टाइम्स न्यूज डेस्क,

लखनऊ के प्रेस क्लब में आयोजित ‘राष्ट्र स्तरीय पसमांदा मुस्लिम चिंतन कार्यशाला’ में उस समय नया विवाद खड़ा हो गया, जब खुद को गैर-राजनीतिक और राष्ट्रवादी बताने वाले ‘आल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज़’ ने सीधे तौर पर राजनीतिक दलों से चुनावी टिकटों की सौदेबाजी शुरू कर दी। संगठन ने वर्तमान राजनीतिक परिवेश का हवाला देकर केवल एक वर्ग विशेष के लिए चुनावी हिस्सेदारी और आरक्षण की मांग उठाई, जिसने इसके सामाजिक सुधार के दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

कार्यशाला में राष्ट्रीय अध्यक्ष परवेज हनीफ और मुख्य कार्यकारी अधिकारी मुहम्मद युनुस की अगुवाई में एक बार फिर जातिगत और धार्मिक विभाजन को हवा देने की कोशिश की गई। खुद को 85 प्रतिशत आबादी का प्रतिनिधि बताते हुए संगठन ने आगामी चुनावों में सीटों पर दबाव बनाना शुरू कर दिया है। महाज़ ने विशेष रूप से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सामने मुरादाबाद देहात, टांडा, मुबारकपुर, कैराना, नगीना, रामपुर स्वार और पीलीभीत सदर जैसी मुस्लिम बहुल सीटों पर केवल पसमांदा उम्मीदवारों को ही टिकट देने की सीधी शर्त रख दी है। आलोचकों का मानना है कि सामाजिक उत्थान के नाम पर यह केवल राजनीतिक ब्लैकमेलिंग और अपना रसूख बढ़ाने की रणनीति है।

इसके अलावा, संगठन ने केंद्र सरकार से अनुच्छेद 341 से धार्मिक प्रतिबंध हटाने, अलग सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना कराने और एक नया ‘पसमांदा आयोग’ गठित करने जैसी मांगें उठाकर देश की मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था को चुनौती देने का प्रयास किया है। मदरसों और अल्पसंख्यक संस्थानों में 25% आरक्षण की मांग करके शिक्षा के भगवाकरण और ध्रुवीकरण के आरोपों को भी हवा दी जा रही है। संगठन भले ही खुद को शिया-सुन्नी और मसलकी विभाजनों से ऊपर बता रहा हो, लेकिन हकीकत में टिकटों और आरक्षण के इर्द-गिर्द बुनी गई यह पूरी कार्यशाला समाज में एक नया विभाजन पैदा करने वाली और पूरी तरह से राजनीतिक एजेंडे से प्रेरित नजर आई।

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