एशियाई अर्थव्यवस्था पर मंडराता बड़ा खतरा
: घटती उत्पादकता, गहराता बुजुर्ग संकट और व्यापारिक टूटन से मंदी के मुहाने पर महाद्वीप

निश्चय टाइम्स न्यूज डेस्क
वैश्विक आर्थिक विकास की धुरी कहे जाने वाले एशियाई महाद्वीप पर अब गंभीर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। कभी दुनिया का कारखाना और विकास का इंजन रहा एशिया आज पुरानी नीतियों की सीमाओं, सुस्त होती उत्पादकता और तीखे होते जनसांख्यिकीय (डेमोग्राफिक) संकट के चलते बर्बादी की कगार पर खड़ा है। वियतनाम और कोरिया जैसे देशों की शुरुआती चमक अब फीकी पड़ने लगी है, क्योंकि महाद्वीप की पारंपरिक विकास गाथा अब अपनी चरम सीमा पार कर चुकी है और अंधकारमय भविष्य की ओर बढ़ रही है।
विश्लेषण के अनुसार, एशिया में उत्पादकता की रफ्तार खतरनाक रूप से धीमी हो चुकी है। भारी-भरकम पूंजी निवेश के बावजूद वित्तीय प्रणालियों और बैंकों की पुरानी व सड़ियल व्यवस्था के कारण धन का प्रवाह सही दिशा में नहीं हो रहा है, जिससे संसाधनों की भारी बर्बादी हो रही है। दूसरी ओर, बढ़ती उम्र का अभिशाप महाद्वीप को अंदर से खोखला कर रहा है। दशकों में जन्म दर 6 बच्चों प्रति महिला से लुढ़क कर मात्र 1.6 पर आ गई है, और 2050 तक हर पांच में से एक एशियाई नागरिक बुजुर्ग हो चुका होगा। जापान, चीन और कोरिया जैसे देश पहले ही बूढ़ी होती आबादी और सिकुड़ते कार्यबल के भीषण संकट से जूझ रहे हैं।
वैश्विक व्यापार में बढ़ती खंदक और भू-आर्थिक विखंडन ने एशियाई अर्थव्यवस्थाओं की कमर तोड़ दी है। भारी ऊर्जा आयात और जीवाश्म ईंधन पर अंधाधुंध निर्भरता ने देशों को वैश्विक संघर्षों और जलवायु झटकों के प्रति बेहद संवेदनशील बना दिया है। इसके अलावा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और आधुनिक तकनीकों के अंधाधुंध प्रसार ने आम आदमी की नौकरियों पर तलवार लटका दी है, जिससे अमीर और गरीब के बीच की खाई विकराल रूप ले चुकी है। यदि समय रहते नीतियों में आमूल-चूल परिवर्तन नहीं किया गया, तो एशिया के लिए अमीर बनने से पहले ही बूढ़ा और कंगाल हो जाना तय है।



