अकादमिक दौरों के नाम पर सिर्फ औपचारिकता: वित्तीय संकट से जूझते यूनानी संस्थानों में भव्य स्वागत और आवभगत का दौर

निश्चय टाइम्स न्यूज डेस्क
जहां देश के सरकारी यूनानी मेडिकल कॉलेज और शोधार्थी बुनियादी सुविधाओं, शोध बजट और समय पर स्टाइपेंड न मिलने जैसी गंभीर वित्तीय विसंगतियों से जूझ रहे हैं, वहीं लखनऊ के राजकीय तकमिलुत्तिब कॉलेज में दौरों और स्वागत-सत्कार के नाम पर संसाधनों की बर्बादी का एक और निराशाजनक उदाहरण सामने आया है। जामिया हमदर्द के पूर्व कुलपति प्रोफेसर एम.ए. जाफरी के दो दिवसीय लखनऊ प्रवास के दौरान कॉलेज प्रशासन ने जनहित और शैक्षणिक सुधारों को दरकिनार कर केवल गुलपोशी, शॉल ओढ़ाने और स्वागत समारोहों के आडंबर में अपनी पूरी ऊर्जा खपा दी।

शोधार्थियों के साथ ऐतिहासिक खिलवाड़: अतीत के मामूली वजीफे और शोध पर खुद की जेब से खर्च का कड़वा सच
इस गरिमामयी दिखने वाले समारोह के पीछे छिपे गहरे संस्थागत और वित्तीय शोषण के नैरेटिव को खुद विभागाध्यक्ष प्रोफेसर मनीराम सिंह ने बेनकाब कर दिया। उन्होंने अपने पुराने अनुभवों को साझा करते हुए उजागर किया कि शोध के दौरान छात्रों को प्रति माह मात्र $12300$ रुपये का मामूली वजीफा मिलता था। हद तो यह है कि शोधार्थियों को रिसर्च ड्रग्स के मानकीकरण और पहचान (Identification) जैसे बुनियादी काम के लिए भी अपनी जेब से $8500$ रुपये खर्च करने पड़े थे। यह वाकया साफ बयां करता है कि देश के प्रीमियर यूनानी संस्थानों में शोध और अनुसंधान को हमेशा से वित्तीय रूप से हाशिए पर रखा गया है, जहां छात्रों को अपनी जेबें ढीली करनी पड़ती हैं।
टीचिंग मेथोडोलॉजी पर केवल खोखले व्याख्यान; जमीनी स्तर पर प्रशासनिक उपेक्षा और संसाधनों का अभाव
समारोह में ‘टीचिंग मेथोडोलॉजी’ जैसे विषयों पर लंबे-चौड़े व्याख्यान तो दिए गए, लेकिन कॉलेज में व्याप्त शिक्षकों की कमी, आधुनिक प्रयोगशालाओं के अभाव और पारंपरिक चिकित्सा विधाओं के प्रति सरकार की घोर उपेक्षा पर कोई ठोस विमर्श नहीं हुआ। प्राचार्य प्रोफेसर अब्दुल कवि और डॉ. शमीम इरशाद की मौजूदगी में आयोजित इस कार्यक्रम में 150 से अधिक अधिकारियों और कर्मचारियों को केवल भीड़ बढ़ाने के लिए बैठाया गया। बजट की कमी का रोना रोने वाले सरकारी संस्थान जब इस तरह की खर्चीली औपचारिकताएं निभाते हैं, तो वह पूरे प्रशासनिक ढांचे की जवाबदेही और प्राथमिकताओं पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।



