₹29,000 करोड़ के सरकारी बॉन्ड की नीलामी: बढ़ते कर्ज के बोझ पर फिर उठे सवाल
सरकारी सिक्योरिटीज़ की री-इश्यू प्रक्रिया पर बहस, क्या कर्ज के सहारे चल रही अर्थव्यवस्था?

- बॉन्ड बाजार पर बढ़ती निर्भरता: सरकार की वित्तीय रणनीति पर विशेषज्ञों की चिंता
निश्चय टाइम्स न्यूज डेस्क | डी एफ हिंदी
भारत सरकार ने 6 मार्च 2026 को ₹29,000 करोड़ मूल्य की सरकारी प्रतिभूतियों (Government Securities) की बिक्री के लिए अंडरराइटिंग नीलामी आयोजित करने की घोषणा की है। इस नीलामी के माध्यम से 6.68% जीएस 2040 और 6.90% जीएस 2065 बॉन्ड को पुनः जारी किया जाएगा। हालांकि यह प्रक्रिया सरकारी उधारी प्रबंधन का सामान्य हिस्सा मानी जाती है, लेकिन बढ़ते कर्ज और वित्तीय घाटे के बीच इस कदम ने आर्थिक विशेषज्ञों के बीच नई बहस छेड़ दी है।
घोषणा के अनुसार ₹16,000 करोड़ के 6.68% जीएस 2040 और ₹13,000 करोड़ के 6.90% जीएस 2065 बॉन्ड को बाजार में उतारा जाएगा। इस पूरी प्रक्रिया में प्राइमरी डीलरों (Primary Dealers) को न्यूनतम अंडरराइटिंग प्रतिबद्धता (MUC) और अतिरिक्त प्रतिस्पर्धी अंडरराइटिंग (ACU) के तहत बोली लगाने की अनिवार्यता होगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी प्रतिभूतियों के जरिए बड़े पैमाने पर कर्ज जुटाना भारतीय अर्थव्यवस्था में बढ़ती वित्तीय निर्भरता का संकेत भी हो सकता है। कई अर्थशास्त्रियों का कहना है कि लगातार बढ़ती सरकारी उधारी भविष्य में ब्याज भुगतान के बोझ को और अधिक बढ़ा सकती है।
आलोचकों का तर्क है कि यदि सरकार राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करने के बजाय लगातार बाजार से उधार लेकर खर्च चलाती है, तो इसका दीर्घकालिक असर अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। इससे निजी क्षेत्र के लिए भी पूंजी की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है, जिसे अक्सर “क्राउडिंग आउट” प्रभाव कहा जाता है।
नीलामी प्रक्रिया भारतीय रिज़र्व बैंक के ई-कुबेर (e-Kuber) सिस्टम के माध्यम से सुबह 9:00 बजे से 9:30 बजे के बीच आयोजित की जाएगी, जिसमें प्राइमरी डीलर इलेक्ट्रॉनिक तरीके से अपनी बोलियां प्रस्तुत करेंगे। इसके बाद सफल प्रतिभागियों को अंडरराइटिंग कमीशन आरबीआई के साथ उनके चालू खातों में जमा किया जाएगा।
हालांकि सरकार और केंद्रीय बैंक इस प्रक्रिया को बाजार की स्थिरता बनाए रखने के लिए आवश्यक बताते हैं, लेकिन आलोचकों का मानना है कि बार-बार बड़े पैमाने पर सरकारी प्रतिभूतियों की बिक्री से यह संदेश भी जा सकता है कि सरकार की वित्तीय जरूरतें लगातार बढ़ रही हैं।
बढ़ती वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं और घरेलू वित्तीय चुनौतियों के बीच ₹29,000 करोड़ की यह नीलामी एक बार फिर इस सवाल को सामने ला रही है कि क्या भारत की अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे कर्ज आधारित वित्तीय मॉडल की ओर बढ़ रही है।



