पावर सेक्टर में ‘महा-एकाधिकार’ की तैयारी: PFC और REC के विलय को मंजूरी, ₹11 लाख करोड़ के भारी-भरकम कर्ज पर टिकी महा-इकाई!

निश्चय टाइम्स न्यूज डेस्क
एकाधिकार का खतरा, दांव पर पावर सेक्टर! देश के पावर सेक्टर को फाइनेंस करने वाली दो सबसे बड़ी सरकारी कंपनियों—पावर फाइनेंस कॉर्पोरेशन (PFC) और REC लिमिटेड के निदेशक मंडल ने विलय की योजना को मंजूरी दे दी है। भले ही इसे एक सोची-समझी व्यावसायिक रणनीति बताया जा रहा हो, लेकिन इस विलय से ₹11 लाख करोड़ से अधिक के कर्ज भंडार वाली एक ऐसी ‘महा-इकाई’ खड़ी होगी, जो पूरे बाजार में एकाधिकार (Monopoly) स्थापित कर देगी। इस क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा खत्म होने से अंततः नुकसान आम उपभोक्ताओं और पावर इंफ्रास्ट्रक्चर को ही झेलना पड़ेगा।
शेयरधारकों के साथ खेल? अजीब स्वैप रेशियो! विलय की शर्तों के मुताबिक, REC के शेयरधारकों को उनके हर 100 शेयरों (₹10 मूल्य) के बदले PFC के सिर्फ 88 शेयर मिलेंगे। इस असमान शेयर विनिमय अनुपात (Swap Ratio) को लेकर बाजार के जानकारों में भारी चिंता है। यह रेशियो REC के उन निवेशकों के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है, जिन्होंने कंपनी के स्वतंत्र प्रदर्शन पर भरोसा जताया था। अब दोनों कंपनियों का भविष्य एक ही टोकरी में बंद होने जा रहा है, जो वित्तीय जोखिम को कई गुना बढ़ा देता है।
अड़चनों का पहाड़, रेगुलेटर्स की टेढ़ी नजर! यह विलय इतना आसान भी नहीं है। इसके लिए अभी शेयरधारकों, लेनदारों (Creditors), और कई कड़े सरकारी व नियामक प्राधिकरणों की मंजूरियों के अग्निपथ से गुजरना होगा। सबसे बड़ी शर्त यह है कि इस महा-इकाई का ‘सरकारी कंपनी’ का दर्जा बना रहना चाहिए और सरकार का नियंत्रण कम नहीं होना चाहिए। जानकारों का मानना है कि इतनी विशालकाय और भारी-भरकम कर्ज (₹11 लाख करोड़) के बोझ से दबी इकाई का प्रबंधन करना एक प्रशासनिक और वित्तीय दुःस्वप्न साबित हो सकता है।



