राष्ट्रीय

डॉलर के बाजार में मच गया भयंकर गदर विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने भारत से समेटा $16.4 बिलियन का बोरिया-बिस्तर

सोने की आसमान छूती कीमतों ने बचा ली देश की लाज; विदेशी मुद्रा भंडार में $22.8 बिलियन का उछाल

निश्चय टाइम्स न्यूज़ डेस्क


देश के आर्थिक गलियारों और सट्टा बाज़ारों से इस वक्त की सबसे बड़ी और चौंकाने वाली वित्तीय खबर सामने आ रही है। भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने वित्तीय वर्ष 2025-26 के भुगतान संतुलन (बीओपी) के जो आंकड़े जारी किए हैं, उसने आर्थिक मठाधीशों के होश उड़ा दिए हैं। आंकड़ों के इस महा-मंथन से साफ हो गया है कि भारतीय बाजार में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FIIs) ने ऐसा कोहराम मचाया कि देश से 16.4 बिलियन अमेरिकी डॉलर की भारी-भरकम रकम झटके में बाहर खींच ली, जिससे कुल विदेशी निवेश का ग्राफ शून्य से नीचे माइनस (-) $9.4 बिलियन के पाताल में चला गया!

चालू खाते का बढ़ता छेद और विदेशी निवेशकों की बेवफाई!
देश का चालू खाता शेष (Current Account Deficit) पिछले साल के $23.1 बिलियन से और ज्यादा गहराकर $25.4 बिलियन के पार पहुंच गया है। यानी आमदनी अठन्नी और खर्चा रुपइया वाला हाल हो चुका है। पूंजी लेखा (पूंजीगत लेनदेन) के मोर्चे पर भी भारी गिरावट देखी गई, जो पिछले साल के $18.0 बिलियन से घटकर महज $1.8 बिलियन पर सिमट कर रह गई। लेकिन गनीमत इस बात की रही कि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) के वफादार शेरों ने मोर्चा संभाला और यह $1.0 बिलियन से बढ़कर $6.9 बिलियन पर पहुंच गया।

सोने की चमक ने डूबती नैया को पार लगाया!
अब बात करते हैं उस जादुई ट्विस्ट की, जिसने आरबीआई की तिजोरी को खाली होने से बचा लिया। भुगतान संतुलन के शुद्ध आधार पर (मूल्यन प्रभावों को छोड़कर) तो हमारे विदेशी मुद्रा भंडार में 23.6 बिलियन अमरीकी डॉलर की भारी ऐतिहासिक कमी हुई थी, जो पिछले साल महज $5.0 बिलियन थी। लेकिन वैश्विक बाजार में सोने (Gold) की रिकॉर्ड तोड़ कीमतों और अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अन्य प्रमुख मुद्राओं में आए बदलाव ने ऐसा कमाल दिखाया कि मूल्यन प्रभाव (Valuation Effect) के रूप में भारत को $46.4 बिलियन का बम्पर लॉटरी अभिलाभ मिल गया! इसी कागजी और मूल्यन जादूगरी के दम पर भारत का विदेशी मुद्रा भंडार सांकेतिक तौर पर कुल मिलाकर $22.8 बिलियन की सम्मानजनक वृद्धि दर्ज करने में कामयाब रहा। साफ बात है, अगर सोने की कीमतों ने सहारा न दिया होता, तो देश की अर्थव्यवस्था का कबाड़ा होना तय था!

Related Articles

Back to top button