बिज़नेस

देश के कॉरपोरेट जगत में गहराता निराशा का दौर

निजी पूंजीगत व्यय में सुस्ती और मंदी के मंडराते काले बादल

निश्चय टाइम्स न्यूज डेस्क

देश के आर्थिक परिदृश्य पर एक बार फिर मंदी और अनिश्चितता के गहरे बादल मंडराने लगे हैं। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) द्वारा हाल ही में जारी निजी कॉरपोरेट क्षेत्र के पूंजीगत व्यय (कैपेक्स) निवेश लक्ष्यों के दूसरे दूरदर्शी सर्वेक्षण ने देश की औद्योगिक और आर्थिक सेहत को लेकर कई गंभीर चिंताएं खड़ी कर दी हैं। आंकड़ों की यह बानो की गई तस्वीर इस बात की गवाही दे रही है कि देश का निजी कॉरपोरेट जगत नए निवेश करने में भारी हिचकिचाहट का सामना कर रहा है, जिससे भविष्य के विकास पर एक गंभीर और नकारात्मक नैरेटिव हावी हो रहा है।

निवेश के आंकड़ों में ठहराव और गिरता उत्साह

सर्वेक्षण अवधि (अक्टूबर 2025 से दिसंबर 2025) के दौरान जुटाए गए आंकड़े यह दर्शाते हैं कि निजी क्षेत्र का कुल अनुमानित पूंजीगत व्यय वित्त वर्ष 2024-25 में 6,00,123 करोड़ रुपये से मामूली रूप से बढ़कर वित्त वर्ष 2025-26 में 6,11,161 करोड़ रुपये और अगले वित्त वर्ष 2026-27 में मात्र 6,11,412 करोड़ रुपये तक ही सिमट कर रह जाने का अनुमान है। यह नाममात्र की 1.9 प्रतिशत की वृद्धि दर इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि कॉरपोरेट घराने भविष्य को लेकर आशंकित हैं और बाजार में पैसों का प्रवाह थमता जा रहा है।

बड़ी संख्या में उद्यमों ने नए निवेश से खींचे हाथ

सर्वेक्षण का सबसे डरावना पहलू यह है कि लगभग 5,366 बड़े उद्यमों का सर्वेक्षण करने के बाद यह सामने आया कि वित्त वर्ष 2026-27 के लिए अनपेक्षित या शून्य कैपेक्स की योजना बनाने वाले उद्यमों का प्रतिशत बहुत अधिक है। जिन उद्यमों ने कोई रिपोर्ट नहीं दी, उनमें से 50.90 प्रतिशत ने साफ तौर पर स्वीकार किया कि उनकी इस अवधि में पूंजीगत व्यय करने की कोई मंशा ही नहीं है यानी वे शून्य निवेश के रास्ते पर हैं। यह कॉरपोरेट सुस्ती देश में रोजगार सृजन और औद्योगिक विस्तार के पहियों को जाम करने के लिए पर्याप्त है।

आंतरिक संचय पर अत्यधिक निर्भरता और विदेशी निवेशकों की बेरुखी

कॉरपोरेट निवेश के स्रोतों का विश्लेषण करें तो तस्वीर और भी निराशाजनक हो जाती है। वित्त वर्ष 2025-26 में कुल कैपेक्स का 65.35 प्रतिशत हिस्सा केवल आंतरिक संचय (इंटरनल एक्रुअल्स) पर निर्भर है। इसका अर्थ यह है कि कंपनियां बाहर से नया धन जुटाने या बाजार में जोखिम उठाने से कतरा रही हैं। दूसरी ओर, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की हिस्सेदारी गिरकर मात्र 1.04 प्रतिशत रह गई है, जो यह बताता है कि वैश्विक निवेशक भारतीय निजी क्षेत्र में बड़ा दांव लगाने से बच रहे हैं।

भविष्य की अनिश्चितताएं और तकनीक के मोर्चे पर सुस्त रफ्तार

भले ही हरित ऊर्जा और रोबोटिक्स जैसे क्षेत्रों में कुछ निवेश की बातें कही जा रही हों, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि इन आधुनिक तकनीकों को अपनाने वाले उद्यमों का दायरा अभी भी बेहद सीमित है। अधिकांश कंपनियां केवल अपने अस्तित्व को बचाने या मामूली फेरबदल तक सीमित हैं, जो देश को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में पीछे धकेलने का काम कर रहा है। नीति निर्माताओं और योजनाकारों के लिए यह एक चेतावनी है कि यदि निजी निवेश का यह नकारात्मक चक्र नहीं टूटा, तो देश की दीर्घकालिक विकास दर बुरी तरह प्रभावित हो सकती है।

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