
निश्चय टाइम्स न्यूज डेस्क
उत्तर प्रदेश खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन (UPFSDA) द्वारा हाल ही में जारी किए गए फरमानों ने एक बार फिर प्रशासनिक तंत्र की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। 1 नवंबर 2026 से लागू होने वाले नए आदेशों के तहत सभी रिटेल और अस्पताल फार्मेसियों को पब्लिक वेबसाइट बनाकर दवाओं की खरीद (PTR) और बिक्री (PTC) कीमतें सार्वजनिक करने को कहा गया है। हालांकि विभाग इसे ‘पारदर्शिता’ का नाम दे रहा है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि लगातार बदलते नियमों और जटिल डिजिटल अनुपालन (Digital Compliance) के इस मकड़जाल में छोटे और मध्यम दवा व्यापारी बुरी तरह पिसते नजर आ रहे हैं।
थोक लाइसेंस पर रोक और त्योहारों की सियासत
सबसे बड़ा विरोधाभास इस बात में है कि जिस विभाग ने महज कुछ महीने पहले (23 जुलाई 2026) नए थोक बिक्री लाइसेंस जारी करने पर अनिश्चितकालीन रोक लगाकर कारोबारियों की कमर तोड़ दी थी, उसे अब आगामी नवरात्रि त्योहार के मद्देनजर 11 अक्टूबर से हटाने का ढोंग रचा जा रहा है। क्या त्योहारी सीजन की आड़ में लाइसेंस प्रक्रिया को रोकना और फिर अचानक बहाल करना प्रशासनिक मनमानी का खुला प्रमाण नहीं है? महीनों तक लाइसेंस के लिए भटकने वाले व्यापारियों के आर्थिक नुकसान की भरपाई कौन करेगा?
अस्पतालों की लूट पर महज कागजी शिकंजा
दूसरी ओर, अस्पताल परिसरों में संचालित वे फार्मेसियां, जहां मरीजों के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं होता, वे खुलेआम मरीजों की जेब पर डाका डाल रही हैं। विभाग ने भले ही खरीद और बिक्री मूल्य को वेबसाइट पर डालने का आदेश दे दिया है, लेकिन क्या महज एक वेब लिंक या क्यूआर कोड लग जाने से अस्पतालों की लूट रुक जाएगी? जब तक धरातल पर कड़े प्रवर्तन और औचक निरीक्षण नहीं होते, तब तक यह आदेश भी फाइलों में दफन होकर रह जाएगा।
प्रशासन की इन अदूरदर्शी नीतियों के कारण एक तरफ जहां व्यापारी लालफीताशाही के शिकार हो रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ आम मरीज लुटने को मजबूर है।



