मौत के सौदागर: अस्पतालों की लूट के जाल में सिसकती जिंदगी!

निश्चय टाइम्स न्यूज डेस्क
उत्तर प्रदेश खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन (यूपीएफएसडीए) की हालिया जांच ने चिकित्सा जगत के सबसे काले और वीभत्स चेहरे को बेनकाब कर दिया है। राज्य के निजी अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों की फार्मेसियों में चल रहा यह संगठित खेल इंसानियत के सीने पर खंजर चलाने जैसा है, जहां जीवनरक्षक दवाएं मुनाफे का धंधा बन चुकी हैं।
₹74 की दवा, ₹5,000 की लूट!
जांच के चौंकाने वाले आंकड़े बताते हैं कि गंभीर संक्रमण और आईसीयू में मौत से जूझ रहे मरीजों को दी जाने वाली दवाएं लूट का खुला लाइसेंस बन चुकी हैं।
- पॉलीमक्सिन-बी (Polymyxin-B): मात्र ₹74.09 में खरीदी जाने वाली यह जीवनरक्षक दवा मरीजों पर ₹4,980.94 की एमआरपी के नाम पर थोपी जा रही है—यानी सीधे 67 गुना की भयानक लूट!
- टेर्लिप्रेसिन (Terlipressin): लिवर की गंभीर बीमारी में सांसें थामने वाली इस दवा की खरीद महज ₹56 है, जबकि इसका दाम ₹3,050 वसूला जा रहा है।
- कैस्पोफंगिन (Caspofungin): फंगल इन्फेक्शन के इलाज में ₹800 की दवा को ₹21,230 में बेचा जा रहा है।
कैंसर के मरीजों का आर्थिक कत्लेआम
मामला सिर्फ संक्रमण तक सीमित नहीं है। कैंसर जैसी लाइलाज और भयानक बीमारी से लड़ रहे मरीजों का भी बेरहमी से आर्थिक कत्लेआम किया जा रहा है। Bevacizumab 400 mg जैसी दवा पर खरीद और एमआरपी के बीच ₹62,453 से अधिक का अंतर साफ तौर पर अस्पताल और दवा निर्माताओं के खूनी गठजोड़ की गवाही देता है।
छूट का बहुरुपिया छलावा
अस्पतालों का यह ‘डिस्काउंट का मायाजाल’ मरीजों को मूर्ख बनाने का शातिर षड्यंत्र है। पहले एमआरपी को आसमान पर पहुँचाया जाता है, और फिर भारी छूट का लालच देकर मरीज को यह विश्वास दिलाया जाता है कि उसे रियायत मिल रही है। हकीकत यह है कि सस्ती दरों पर मिलने वाले इन इंजेक्शन्स और मेडिकल डिवाइसेज (जैसे ₹6.40 के स्टॉप कॉक को ₹163 में बेचना) के जरिए जनता की जेब पर डाका डाला जा रहा है। जब अस्पताल ही मौत के सौदागर बन जाएं, तो न्याय की गुहार कहां लगाई जाए?



