राष्ट्रीय

एक ब्रांड, एक दवा, अलग-अलग MRP का खेल!

एफएसडीए की जांच में हजारों का फर्क, मरीज की जेब पर कीमतों का बोझ—अब गेंद एनपीपीए के पाले में

निश्चय टाइम्स न्यूज डेस्क

एक ही कंपनी, एक ही ब्रांड और एक ही दवा—लेकिन अलग-अलग संस्थागत आपूर्ति में अलग-अलग अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP)। उत्तर प्रदेश खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन (एफएसडीए) की प्रदेशव्यापी जांच में सामने आए ये आंकड़े दवा कीमतों की पारदर्शिता और मरीजों के हित पर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं।

प्रदेश के 214 अस्पतालों की फार्मेसियों से जुटाए गए आंकड़ों के तुलनात्मक अध्ययन में 167 दवाओं की सूची सामने आई है, जिनमें कई प्रमुख दवाओं की एमआरपी में कुछ सौ रुपये से लेकर हजारों रुपये तक का अंतर दर्ज हुआ है। गंभीर बीमारियों के उपचार में इस्तेमाल होने वाली महंगी दवाएं भी इस दायरे में शामिल हैं।

एक दवा, कीमत अलग

एफएसडीए के आंकड़ों के मुताबिक रिलायंस लाइफसाइंसेज की टेनक्टे-प्लेज 40 एमजी यानी टेनक्टेरेल की संस्थागत आपूर्ति में एमआरपी ₹43,119.14 से ₹49,060 तक दर्ज मिली। अंतर—₹5,940.86।

इंटास की एल्बुसेल में एमआरपी ₹7,986 और ₹10,989 दर्ज मिली। अंतर—₹3,003। वहीं बेनेटास में करीब ₹5,699.10 और फिलग्रास्टिम की न्यूकाइन में ₹655.63 का अंतर सामने आया।

इनोंजा ने खोली सबसे बड़ी खाई

सबसे बड़ा अंतर फाइजर की इनोटुजुमैब ओजोगामाइसिन 1 एमजी यानी इनोंजा में दर्ज हुआ। अलग-अलग संस्थागत आपूर्ति में एमआरपी ₹3,02,610 और ₹3,30,000 मिली—यानी ₹27,390 का अंतर।

सवाल सीधा है—एक ही ब्रांड और एक ही दवा की कीमत निर्धारण व्यवस्था आखिर किस आधार पर इतनी अलग हो सकती है?

कई दवाओं में तस्वीर समान

गुफिक बायोसाइंसेज की विभिन्न दवाओं में भी एमआरपी का अंतर मिला। कोलिस्टिमेथेट 4.5 एमआईयू में ₹1,683.87, 2 एमआईयू में ₹670.22, टाइगेसाइक्लिन में ₹1,326.47 और कैस्पोफंगिन 70 एमजी में ₹880 तक का अंतर दर्ज हुआ।

अन्य दवाओं और वैक्सीन में भी सैकड़ों रुपये का अंतर सामने आया।

मरीज के सामने असली सवाल

एमआरपी केवल पैकेट पर छपी संख्या नहीं है। जब वही उत्पाद अलग-अलग संस्थागत आपूर्ति में अलग-अलग अधिकतम मूल्य के साथ बाजार में पहुंचता है, तो कीमत तय करने की प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

एफएसडीए का कहना है कि व्यावसायिक शर्तों और ट्रेड मार्जिन से ऐसे अंतर प्रभावित हो सकते हैं। लेकिन अंतिम भार अक्सर उस मरीज पर पड़ता है, जो बीमारी के बीच कीमतों की इस जटिल व्यवस्था को समझने की स्थिति में नहीं होता।

एफएसडीए ने दिखाई तस्वीर, अब गेंद केंद्र के पाले में

एफएसडीए ने 167 दवाओं की सूची भारत सरकार और एनपीपीए के साथ साझा की है। वैज्ञानिक और पारदर्शी मूल्य निर्धारण व्यवस्था, उचित ट्रेड मार्जिन तथा अस्पतालों में प्रयुक्त दवाओं को मूल्य-नियंत्रित सूची में शामिल करने जैसे मुद्दों पर केंद्र से आवश्यक कदम उठाने का अनुरोध किया गया है।

यहीं सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है—जब राज्य की जांच में इतना बड़ा अंतर सामने आ गया, तो अब कार्रवाई की जिम्मेदारी किसकी है?

एफएसडीए की पहल ने समस्या को उजागर किया है, लेकिन केवल आंकड़े जुटाकर और गेंद एनपीपीए के पाले में डालकर क्या मरीज को राहत मिल जाएगी? केंद्र और राज्य सरकारों के सामने अब चुनौती सिर्फ जवाब देने की नहीं, बल्कि दवा कीमतों की ऐसी पारदर्शी व्यवस्था बनाने की है जिसमें बीमारी मरीज की मजबूरी बने, उसकी आर्थिक कमजोरी नहीं।

पारदर्शिता का नया दबाव

एफएसडीए ने अस्पताल फार्मेसियों में PTR यानी वास्तविक क्रय दर और PTC यानी मरीज को दी जाने वाली बिक्री दर स्पष्ट रूप से घोषित करने की व्यवस्था पर जोर दिया है। रिटेल फार्मेसियों को भी लाइसेंस, फार्मासिस्ट और स्टॉक संबंधी जानकारी सार्वजनिक करने को कहा गया है।

लेकिन सवाल फिर वही है—जब एक ब्रांड की एमआरपी ही अलग-अलग हो, तो मरीज किस कीमत को वास्तविक कीमत माने?


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