लखनऊ किराना कमेटी में खुली बगावत
मंत्री अमित अग्रवाल ने पद से हटने का किया ऐलान, पदाधिकारियों पर गंभीर आरोप

“नाम बड़े, दर्शन छोटे” — व्यापारियों के हितों पर उठे सवाल
लखनऊ किराना कमेटी के भीतर लंबे समय से चल रही कथित अंतर्कलह अब खुलकर सामने आती दिखाई दे रही है। कमेटी के मंत्री अमित अग्रवाल ने कार्यकारिणी से स्वयं को अलग करने की घोषणा करते हुए संस्था की कार्यप्रणाली और व्यापारियों के हितों को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं।
अमित अग्रवाल के अनुसार, यदि संस्था से जुड़े व्यापारियों की कठिन परिस्थितियों में सहायता नहीं की जा सकती, तो ऐसे पद पर बने रहने का कोई औचित्य नहीं है। उन्होंने इसी भावना और आत्मग्लानि का हवाला देते हुए खुद को कमेटी की कार्यकारिणी से मुक्त करने का निवेदन किया है।
संस्था के संचालन पर सवाल
अमित अग्रवाल ने आरोप लगाया है कि प्रशांत अग्रवाल, रामशंकर अवस्थी और राजेंद्र अग्रवाल संस्था का संचालन व्यापारियों के सामूहिक हितों के बजाय कथित तौर पर निजी हितों के लिए कर रहे हैं। उनके इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि इस सामग्री के आधार पर नहीं हुई है।
व्यापारियों के उत्पीड़न का आरोप
अमित अग्रवाल के बयान में यह भी आरोप लगाया गया है कि कुछ पदाधिकारी व्यापारियों की समस्याओं में उनके साथ खड़े होने के बजाय उनके खिलाफ शिकायतें करते हैं। आरोप के मुताबिक, अधिकारियों के समक्ष शिकायत किए जाने के बाद कथित तौर पर समझौते अथवा आपसी मोलभाव की स्थिति पैदा की जाती है।
करोड़ों रुपये फंसने का दावा
अमित अग्रवाल का दावा है कि लखीमपुर, सीतापुर, बहराइच और गोंडा के बाजारों में व्यापारियों का करोड़ों रुपये का भुगतान फंसा हुआ है। इसके बावजूद, जीएसटी, मंडी समिति अथवा अन्य विभागीय कार्रवाई का सामना कर रहे व्यापारियों के साथ कमेटी के पदाधिकारियों की सक्रिय मौजूदगी नजर नहीं आती।
संरक्षण के बजाय दूरी?
व्यापारियों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि उनका प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था संकट के समय उनके साथ खड़ी नहीं होती, तो उसकी वास्तविक भूमिका क्या रह जाती है? अमित अग्रवाल के इस्तीफे के ऐलान ने इसी सवाल को फिर केंद्र में ला दिया है।
जांच की मांग तेज होने के आसार
मंत्री के पद से हटने के ऐलान के बाद कमेटी की कार्यप्रणाली, व्यापारियों की शिकायतों और संस्था की जवाबदेही को लेकर नए सिरे से चर्चा शुरू हो गई है। यदि आरोपों को लेकर विवाद बढ़ता है, तो व्यापारियों के बीच निष्पक्ष जांच, पारदर्शी कार्यप्रणाली और जवाबदेही की मांग सामने आ सकती है।
सवाल अब सिर्फ एक पदाधिकारी के हटने का नहीं, बल्कि यह है कि व्यापारियों की संस्था आखिर व्यापारियों के हित में कितनी प्रभावी भूमिका निभा रही है।



