कागजी दावों और जमीनी मोर्चे पर घिरा रबी अभियान
अल-नीनो, कम बारिश और नीतिगत सुस्ती से गहराया किसान संकट

मानसून की दगाबाजी और सूखे की मार
निश्चय टाइम्स न्यूज डेस्क
रबी अभियान 2026-27 के आगाज के बीच कृषि क्षेत्र की चुनौतियां विकराल रूप धारण कर चुकी हैं। अल-नीनो की आशंका और मानसूनी बारिश में 12 प्रतिशत की असमान गिरावट ने देश के कृषि परिदृश्य पर अनिश्चितता के बादल मंडरा दिए हैं। भले ही सरकार रकबे में केवल 1 प्रतिशत की गिरावट का दावा कर रही हो, लेकिन वास्तविकता यह है कि अकेले धान का रकबा 16.32 लाख हेक्टेयर घट चुका है। वहीं, कर्नाटक, महाराष्ट्र और गुजरात समेत 7 राज्यों में 6.11 लाख हेक्टेयर से अधिक फसल सूखे और बाढ़ की भेंट चढ़ चुकी है।
खाद संकट और बजटीय आवंटन का भंवर
केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 163 लाख मीट्रिक टन खाद के स्टॉक का दावा तो किया, लेकिन पंजाब और अन्य कृषि-प्रधान राज्यों से डीएपी और यूरिया की किल्लत की चीखें लगातार आ रही हैं। 380 लाख मीट्रिक टन की विशाल मांग के सामने जमीनी वितरण प्रणाली चरमराई हुई है। यही नहीं, उत्पादन लक्ष्य को घटाकर 373.93 मिलियन टन करना इस बात का सीधा स्वीकारोक्ति है कि सरकार भी आने वाले संकट से आशंकित है।
पराली पर प्रताड़ना और प्रशासनिक नाकामी
प्रदूषण का ठीकरा किसानों के सिर फोड़े जाने पर कृषि मंत्री ने भले ही सहानुभूति जताई, लेकिन रेड ज़ोन और दंडात्मक कार्रवाइयों पर अंकुश लगाने में प्रशासनिक लाचारी साफ झलकी। पराली प्रबंधन के लिए आवश्यक आधुनिक मशीनरी और ठोस सहयोग के अभाव में किसान आज भी कानूनी शिकंजे और रेड-टेप में पिसने को मजबूर हैं।
दाल-तिलहन खरीद में नोडल एजेंसियों का टालमटोल
बाजार में फसलें न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से नीचे बिकने पर NAFED और NCCF की सीधी खरीद का वादा कागजी ही दिख रहा है। आयात शुल्क में असंतुलन की वजह से घरेलू किसान पस्त हैं और अंतरराष्ट्रीय कीमतों के बीच भारतीय कृषि नीतियां किसानों को राहत पहुँचाने में पूरी तरह पंगु नजर आ रही हैं।



