उत्तर प्रदेश

खाने की थाली पर नियमों का पहरा

लाखाद्य प्रतिष्ठानों की लापरवाही पर ‘जीरो टॉलरेंस’

लाइसेंस से तापमान तक हर कदम पर निगरानी,

निश्चय टाइम्स न्यूज डेस्क

प्रदेश में खाद्य प्रतिष्ठानों की व्यवस्था पर अब सिर्फ लाइसेंस टांग देना पर्याप्त नहीं होगा। खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन विभाग ने खाद्य कारोबारियों के लिए ऐसी विस्तृत अनुपालन गाइडलाइन जारी की है, जिसमें लाइसेंस, स्वच्छता, तापमान, पेस्ट कंट्रोल, खाद्य अपशिष्ट और रिकॉर्ड तक की जवाबदेही तय की गई है। निर्देशों की सख्ती यह सवाल भी खड़ा करती है कि आखिर अब तक इन बुनियादी मानकों की निगरानी कितनी प्रभावी रही?

कागज नहीं, जमीन पर अनुपालन

खाद्य कारोबारियों को एफएसएसएआई लाइसेंस/पंजीकरण के साथ खाद्य सुरक्षा प्रदर्शन बोर्ड और ‘फूड सेफ्टी कनेक्ट’ का क्यूआर कोड प्रदर्शित करना होगा। यानी उपभोक्ता अब सिर्फ भोजन की गुणवत्ता पर भरोसा नहीं करेगा, बल्कि शिकायत का रास्ता भी उसके सामने होगा।

रसोई पर कड़ी नजर

टूटी दीवारें, खराब ड्रेनेज, अपर्याप्त वेंटिलेशन, गंदगी और कीटों की मौजूदगी जैसी स्थितियों को लेकर विभाग ने स्पष्ट मानक तय किए हैं। खाद्य संपर्क में आने वाले बर्तन और उपकरण जंगरोधी तथा आसानी से साफ होने योग्य होने चाहिए।

तापमान में जरा चूक, जोखिम बड़ा

रेफ्रिजरेटर और डीप फ्रीजर का तापमान सिर्फ दिखाना नहीं, उसका रिकॉर्ड रखना भी जरूरी होगा। जमे खाद्य पदार्थों के लिए माइनस 18 डिग्री सेल्सियस और ठंडे खाद्य पदार्थों के लिए 5 डिग्री सेल्सियस से कम तापमान निर्धारित किया गया है।

पके भोजन को दोबारा परोसने से पहले सुरक्षित तरीके से गर्म करने के लिए भी निर्धारित तापमान और समय का पालन करना होगा।

कच्चा-पका अलग

कच्चे और तैयार भोजन के बीच संदूषण रोकना अनिवार्य किया गया है। शाकाहारी और मांसाहारी खाद्य पदार्थों का अलग भंडारण, खाद्य-ग्रेड पैकेजिंग और स्पष्ट पहचान भी जरूरी होगी।

कचरे पर भी निगरानी

खाद्य अपशिष्ट खुले में या किचन में जमा नहीं हो सकेगा। इस्तेमाल किए गए खाद्य तेल के निस्तारण के लिए अधिकृत एजेंसी का इस्तेमाल करना होगा। पानी, तेल, सफाई और कीट नियंत्रण के रिकॉर्ड भी सुरक्षित रखने होंगे।

कर्मचारियों की भी जवाबदेही

फूड हैंडलर्स के लिए हेयरनेट, दस्ताने और एप्रन जरूरी होंगे। संक्रामक बीमारी से पीड़ित व्यक्ति को खाद्य कार्य से दूर रखना होगा।

लापरवाही पर लाल निशान

समाप्ति तिथि पार सामग्री, दूषित भोजन, असुरक्षित तापमान, गंदा पानी, कीट प्रकोप, रासायनिक संदूषण और कच्चे-तैयार भोजन के बीच संदूषण जैसे मामलों को ‘जीरो टॉलरेंस’ के दायरे में रखा गया है।

सवाल अब सिर्फ नियम बनाने का नहीं, बल्कि नियमों को जमीन पर लागू कराने और नियमित निरीक्षण की विश्वसनीयता का है। उपभोक्ता की थाली तक सुरक्षित भोजन पहुंचाने का दावा तभी सार्थक होगा, जब कागजी अनुपालन वास्तविक रसोई तक पहुंचे।

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