
उत्तराधिकार की जंग और पारिवारिक दवाब के आगे झुकीं मायावती?
निश्चय टाइम्स न्यूज डेस्क
बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती का वह बयान, जिसे वे पार्टी और मूवमेंट के हित में लिया गया एक कड़ा फैसला बता रही हैं, असल में पार्टी के भीतर गहरी होती जा रही आंतरिक कलह और परिवारवाद की दास्तां बयां करता है। आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के मुहाने पर खड़ी बसपा के लिए यह फैसला किसी रणनीतिक मास्टरस्ट्रोक से ज्यादा, परिवार के भीतर के भारी दबाव और नेतृत्व के संकट का एक लाचार परिणाम नजर आता है। क्या पार्टी का अनुशासन केवल कमजोर कार्यकर्ताओं के लिए ही बचा है, जबकि वंशवाद और पारिवारिक दखल के आगे सर्वोच्च नेतृत्व को भी घुटने टेकने पड़े हैं?
अशोक सिद्धार्थ का संन्यास और संगठन में बढ़ती अनिश्चितता
यह कोई छिपा तथ्य नहीं है कि आकाश आनंद की पूर्व की अदूरदर्शी कार्यशैली और उनके ससुर अशोक सिद्धार्थ के विवादित राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण बसपा संगठन को भारी उथल-पुथल का सामना करना पड़ा था। अशोक सिद्धार्थ को राजनीति से संन्यास के लिए मजबूर किया जाना इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि पार्टी के भीतर सांगठनिक कमियों और अंतर्कलह ने किस हद तक जड़ें जमा ली थीं। इसके बावजूद, कुछ ही महीनों के भीतर उन्हीं चेहरों को दोबारा मुख्यधारा में वापस लाना इस बात की गवाही देता है कि बसपा में सिद्धांतों और मिशनरी जज्बे से ऊपर पारिवारिक वफादारी और आपसी सौदेबाजी हावी हो चुकी है।
सोशल मीडिया का दिखावा और कार्यकर्ताओं का मोहभंग
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर महज एक प्रायोजित पोस्ट को आकाश आनंद के व्यक्तित्व में आया क्रांतिकारी बदलाव मान लेना, पार्टी के जमीन से जुड़े आम कार्यकर्ताओं के साथ एक क्रूर मजाक जैसा है। वर्षों से खून-पसीना बहाने वाले निष्ठावान बहुजन कार्यकर्ताओं को दरकिनार कर एक बार फिर उसी विफल नेतृत्व पर भरोसा जताना पार्टी के भीतर गहरी हताशा पैदा कर रहा है। ईशान आनंद की ‘बिना पद के सेवा’ वाली बात भी केवल एक राजनीतिक शिगूफा लगती है, जिसका उद्देश्य जनता और कार्यकर्ताओं की सहानुभूति बटोरना मात्र है।
अनिश्चित भविष्य और डूबती नैया का सवाल
मायावती खुद इस बात को स्वीकार करती हैं कि संगठन की स्थिरता अब पूरी तरह से आकाश आनंद के व्यवहार पर निर्भर करती है, जो इस बात का स्पष्ट संकेत है कि पार्टी आलाकमान को खुद अपने ही इस फैसले पर पूरा भरोसा नहीं है। बार-बार बदलते फैसले और संगठनात्मक अस्थिरता यह दर्शाती है कि बसपा अपनी वैचारिक पटरी से भटक चुकी है। यदि यही स्थिति बनी रही, तो आगामी विधानसभा चुनाव में पार्टी के लिए अपनी बची-कुची राजनीतिक जमीन बचाना भी एक असंभव चुनौती साबित होगा।



