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दो राष्ट्रीय पुरस्कार, फिर भी सवालों की दस्तकPMAY-U 2.0 पर

पत्रकारों ने घेरा, सूडा में मंत्री ए.के. शर्मा से मांगा जवाब

निश्चय टाइम्स न्यूज डेस्क

प्रधानमंत्री आवास योजना-शहरी को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार भले ही राष्ट्रीय मंच पर दो पुरस्कारों की उपलब्धि गिना रही हो, लेकिन राज्य नगरीय विकास अभिकरण (सूडा) में पत्रकारों के सवालों ने इस चमक के पीछे छिपे कई जमीनी सवाल सामने ला दिए। विश्व पर्यावास दिवस पर केंद्र सरकार ने यूपी को PMAY-U के BLC घटक में स्वीकृत आवासों के मुकाबले सर्वाधिक आवास पूर्ण करने पर प्रथम पुरस्कार और PMAY-U 2.0 में स्वीकृत आवासों के मुकाबले सर्वाधिक ग्राउंडिंग के लिए तृतीय स्थान दिया है।

पुरस्कार मिला, सवाल भी उठे।

पत्रकारों ने नगर विकास एवं ऊर्जा मंत्री ए.के. शर्मा के सामने सवाल रखा कि यदि उपलब्धियां इतनी बड़ी हैं तो फिर आवेदन से लेकर सत्यापन, स्वीकृति और वास्तविक निर्माण तक कितने परिवार अभी भी इंतजार में हैं? योजना का असली मूल्यांकन पुरस्कारों से होगा या उस परिवार की छत से, जिसके खाते में सहायता पहुंचने के बाद वास्तव में मकान खड़ा हुआ?

उपलब्ध कराए गए राज्यीय आंकड़ों के अनुसार PMAY-U 2.0 के लिए 29,11,575 आवेदन प्राप्त हुए, जबकि पोर्टल पर 6,57,641 आवेदनों का सत्यापन हुआ। इनमें 4,15,342 आवास स्वीकृत और 3,54,211 आवास ग्राउंडेड बताए गए हैं। कुल फंड क्लेम ₹5,090.90 करोड़ तथा प्रक्रिया में लंबित दावे ₹232.58 करोड़ बताए गए। सरकार के अनुसार योजना मांग आधारित है और 3,37,508 लाभार्थियों को ₹3,775.08 करोड़ की पहली किस्त जारी की जा चुकी है।

यहीं से सबसे बड़ा सवाल पैदा होता है—आवेदन और स्वीकृति के बीच इतनी बड़ी दूरी क्यों है? सत्यापन की रफ्तार क्या जरूरतमंद परिवारों की अपेक्षा के अनुरूप है? और जिन आवासों की ग्राउंडिंग हो चुकी है, उनके निर्माण की गुणवत्ता तथा समयबद्ध पूर्णता की निगरानी कौन कर रहा है?

केंद्र के आंकड़े भी ध्यान खींचते हैं।

केंद्रीय PMAY-U 2.0 पोर्टल पर वर्तमान में उत्तर प्रदेश के लिए 6,78,289 डिमांड एंट्री और 2,11,406 स्वीकृत आवास प्रदर्शित हो रहे हैं। पोर्टल राष्ट्रीय स्तर पर योजना को एक करोड़ शहरी परिवारों को सहायता देने के लक्ष्य से जोड़ता है।

इससे यह सवाल और महत्वपूर्ण हो जाता है कि अलग-अलग रिपोर्टिंग चरणों के आंकड़ों को जनता के सामने किस तरह स्पष्ट किया जा रहा है। लाभार्थियों के लिए पारदर्शिता केवल पोर्टल पर आंकड़े दिखाने तक सीमित नहीं होनी चाहिए; उन्हें यह भी पता होना चाहिए कि उनका आवेदन किस स्तर पर है और मकान कब तक पूरा होगा।

मंत्री के सामने असली कसौटी।

सूडा में पत्रकारों के सवालों का केंद्र यही रहा कि राष्ट्रीय पुरस्कार निश्चित रूप से उपलब्धि हैं, लेकिन क्या इन्हें शहरी आवास की पूरी सफलता का प्रमाण माना जा सकता है? केंद्र की पुरस्कार सूची में यूपी को BLC में पहला और PMAY-U 2.0 ग्राउंडिंग में तीसरा स्थान मिला है। साथ ही गुजरात को टाउन प्लानिंग, तमिलनाडु को शेल्टर फंड और छत्तीसगढ़ को निजी कॉलोनियों में EWS/LIG भूमि आरक्षण जैसे विशेष अभ्यासों के लिए सम्मान मिला।

यानी तस्वीर एकतरफा नहीं है। उपलब्धि भी है और सुधार की गुंजाइश भी। अब असली चुनौती पुरस्कारों की चमक को लाभार्थियों की पक्की छत में बदलने की है। सवाल यही है—क्या फाइलों में दर्ज प्रगति जमीन पर गरीब परिवारों की जिंदगी बदल रही है?

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