डिजिटल/साइबर धोखाधड़ी पर राष्ट्रीय कार्यशाला: बैंकिंग सुरक्षा को लेकर आरबीआई का बड़ा कदम
निश्चय टाइम्स न्यूज डेस्क | डी एफ हिंदी

- डिजिटल धोखाधड़ी पर आरबीआई का बड़ा प्रहार, 60 बैंकों के शीर्ष अधिकारियों संग मंथन
- साइबर अपराध पर सख्ती: बैंकिंग तंत्र को सुरक्षित बनाने के लिए दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला
- ग्राहक सुरक्षा से लेकर टेक्नोलॉजी तक, डिजिटल फ्रॉड रोकने की रणनीति पर गंभीर चर्चा
- साइबर-सक्षम धोखाधड़ी के खिलाफ संयुक्त मोर्चा, आरबीआई ने दोहराई प्रतिबद्धता
देश में तेजी से बढ़ती डिजिटल बैंकिंग सेवाओं के साथ साइबर-सक्षम धोखाधड़ी की घटनाओं में भी लगातार वृद्धि दर्ज की जा रही है। इसी चुनौती का सामना करने के लिए भारतीय रिज़र्व बैंक ने 24 और 25 फरवरी 2026 को अपने केंद्रीय कार्यालय, मुंबई में एक उच्चस्तरीय दो दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया। इस कार्यशाला में कार्यपालक निदेशकों और देश के 60 प्रमुख बैंकों के धोखाधड़ी जोखिम प्रबंधन प्रमुखों ने भाग लिया।
यह पहल आरबीआई के निरंतर पर्यवेक्षी और विकासात्मक प्रयासों का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य बैंकिंग प्रणाली को साइबर खतरों से अधिक सुरक्षित और सुदृढ़ बनाना है। कार्यशाला में भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C), गृह मंत्रालय, महाराष्ट्र साइबर पुलिस, वाणिज्यिक बैंकों तथा शहरी सहकारी बैंकों के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी सक्रिय सहभागिता की।
साइबर-सक्षम धोखाधड़ी: बदलती तकनीक, बढ़ती चुनौतियाँ
डिजिटल लेनदेन, यूपीआई, मोबाइल बैंकिंग और इंटरनेट बैंकिंग के विस्तार ने जहां सुविधा बढ़ाई है, वहीं साइबर अपराधियों के लिए नए रास्ते भी खोले हैं। फिशिंग, विशिंग, स्मिशिंग, मालवेयर अटैक, रिमोट एक्सेस फ्रॉड और सोशल इंजीनियरिंग जैसी तकनीकों का इस्तेमाल कर अपराधी ग्राहकों और बैंकों को निशाना बना रहे हैं।
कार्यशाला में इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि साइबर धोखाधड़ी अब केवल तकनीकी समस्या नहीं, बल्कि यह अभिशासन, निगरानी और रणनीतिक प्रबंधन से जुड़ा व्यापक मुद्दा बन चुकी है।
मजबूत अभिशासन और आंतरिक नियंत्रण पर जोर
कार्यक्रम के दौरान सुदृढ़ गवर्नेंस फ्रेमवर्क, बोर्ड-स्तरीय निगरानी, जोखिम पहचान प्रणाली और मजबूत आंतरिक नियंत्रण तंत्र की आवश्यकता पर विस्तार से चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने कहा कि केवल घटना के बाद प्रतिक्रिया देना पर्याप्त नहीं है; बल्कि पूर्वानुमान आधारित निगरानी और जोखिम मूल्यांकन मॉडल अपनाना समय की मांग है।
बैंकों को उन्नत डेटा एनालिटिक्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निंग आधारित फ्रॉड डिटेक्शन सिस्टम और रियल-टाइम ट्रांजैक्शन मॉनिटरिंग सिस्टम के उपयोग को बढ़ाने की सलाह दी गई।
तकनीकी नवाचार और सर्वोत्तम पद्धतियों की साझेदारी
कार्यशाला का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था – चयनित बैंकों द्वारा अपनाई गई सर्वोत्तम पद्धतियों और तकनीकी पहलों की प्रस्तुति। कई बैंकों ने अपने मल्टी-फैक्टर ऑथेंटिकेशन सिस्टम, बिहेवियरल एनालिटिक्स मॉडल और ग्राहक अलर्ट मैकेनिज्म साझा किए।
इन प्रस्तुतियों ने यह स्पष्ट किया कि यदि तकनीक का सुविचारित और व्यवस्थित उपयोग किया जाए, तो साइबर धोखाधड़ी की घटनाओं को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
हितधारकों के बीच समन्वय की आवश्यकता
विशेषज्ञों ने इस बात पर भी बल दिया कि साइबर अपराध से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए केवल बैंकिंग संस्थानों का प्रयास पर्याप्त नहीं है। कानून प्रवर्तन एजेंसियों, साइबर विशेषज्ञों, नियामकों और ग्राहकों के बीच घनिष्ठ समन्वय अनिवार्य है।
गृह मंत्रालय और महाराष्ट्र साइबर पुलिस के अधिकारियों ने जांच प्रक्रिया, डिजिटल ट्रेल ट्रैकिंग और अपराधियों के विरुद्ध त्वरित कार्रवाई के अनुभव साझा किए।
ग्राहक जागरूकता: सुरक्षा की पहली दीवार
आरबीआई ने बैंकों को निर्देशित किया कि वे केंद्रित ग्राहक जागरूकता अभियानों को प्राथमिकता दें। डिजिटल सुरक्षा के प्रति ग्राहकों की समझ बढ़ाना, संदिग्ध लिंक और कॉल से बचाव की जानकारी देना, और समय पर शिकायत दर्ज करने की प्रक्रिया को सरल बनाना अत्यंत आवश्यक है।
खुली चर्चा और भविष्य की प्रतिबद्धता
कार्यशाला का समापन एक खुली चर्चा के साथ हुआ, जिसमें सहभागियों ने अपने सुझाव, अनुभव और चिंताएं साझा कीं। आरबीआई ने स्पष्ट किया कि बैंकिंग प्रणाली की सुदृढ़ता और सत्यनिष्ठा को बनाए रखने के लिए इस प्रकार की सहभागिता निरंतर जारी रहेगी।
डिजिटल युग में बैंकिंग सुरक्षा केवल तकनीकी चुनौती नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आर्थिक सुरक्षा का प्रश्न बन चुकी है। ऐसे में यह कार्यशाला बैंकिंग तंत्र को साइबर खतरों से सुरक्षित रखने की दिशा में एक मजबूत और समयानुकूल पहल मानी जा रही है।



