अमेरिका–ईरान टकराव का असर यूपी तक! महंगा तेल उद्योग और व्यापार पर डाल सकता है भारी बोझ
ऊर्जा संकट और महंगाई का डबल झटका, उद्योग से लेकर कृषि तक प्रभावित हो सकता है उत्तर प्रदेश

वैश्विक तनाव से यूपी के निर्यात सेक्टर पर संकट के बादल, लॉजिस्टिक्स और शिपिंग लागत बढ़ने का खतरा
(निश्चय टाइम्स न्यूज डेस्क | डी.एफ. हिंदी)
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव और संभावित सैन्य संघर्ष के भू-राजनीतिक झटके भले ही हजारों किलोमीटर दूर हों, लेकिन इसका आर्थिक प्रभाव भारत के राज्यों, खासकर उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था और व्यापारिक तंत्र पर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह संघर्ष गंभीर रूप लेता है तो इसका सबसे बड़ा असर ऊर्जा बाजार, वैश्विक व्यापार मार्गों और सप्लाई चेन पर दिखाई देगा।
भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 80 से 85 प्रतिशत आयात करता है, जिसमें बड़ी मात्रा फारस की खाड़ी से होकर आने वाले मार्गों पर निर्भर है। खासकर हॉर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए होने वाली तेल आपूर्ति में किसी भी तरह की बाधा वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों को तेजी से बढ़ा सकती है। इसका सीधा असर पेट्रोल, डीजल, गैस और बिजली की लागत पर पड़ेगा।
ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी का सबसे बड़ा दबाव उत्तर प्रदेश के औद्योगिक केंद्रों—नोएडा, कानपुर, मेरठ और लखनऊ—पर पड़ सकता है। यहां स्थित विनिर्माण इकाइयों के लिए उत्पादन लागत बढ़ना तय है, वहीं परिवहन और लॉजिस्टिक्स खर्च भी तेजी से बढ़ सकते हैं। इसका परिणाम महंगाई और औद्योगिक प्रतिस्पर्धा में गिरावट के रूप में सामने आ सकता है।
प्रदेश के निर्यात आधारित उद्योगों पर भी संकट के बादल मंडरा सकते हैं। कानपुर और आगरा का चमड़ा व फुटवियर उद्योग, मुरादाबाद का पीतल हस्तशिल्प, भदोही के कालीन तथा नोएडा और वाराणसी के वस्त्र उद्योग वैश्विक बाजारों और समुद्री परिवहन पर निर्भर हैं। यदि खाड़ी क्षेत्र में तनाव बढ़ता है तो शिपिंग लागत, बीमा प्रीमियम और माल ढुलाई में देरी जैसी समस्याएं निर्यात कारोबार को प्रभावित कर सकती हैं।
कृषि क्षेत्र भी इस संकट से अछूता नहीं रहेगा। उर्वरक उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले अमोनिया और यूरिया की आपूर्ति का बड़ा हिस्सा मध्य-पूर्व से जुड़ा हुआ है। यदि सप्लाई चेन बाधित होती है तो किसानों को महंगे उर्वरक का सामना करना पड़ सकता है।
पब्लिक पॉलिसी स्ट्रैटेजिस्ट और एसोचैम उत्तर प्रदेश के को-चेयरमैन हसन याकूब के अनुसार, यह संघर्ष सीधे तौर पर उत्तर प्रदेश को प्रभावित नहीं करेगा, लेकिन ऊर्जा कीमतों, वैश्विक व्यापार और लॉजिस्टिक्स के माध्यम से इसका असर प्रदेश के उद्योगों और आपूर्ति तंत्र तक पहुंच सकता है। उन्होंने कहा कि प्रभाव की तीव्रता इस बात पर निर्भर करेगी कि यह संघर्ष कितना लंबा और व्यापक होता है।



