
नमस्ते इंडिया और अविद जैसे घी ब्रांडों को लेकर भी उठे सवाल; असली कसूरवार कौन—मिलावटखोर या कमजोर निगरानी व्यवस्था?
निश्चय टाइम्स न्यूज डेस्क |
अगर खाद्य सुरक्षा विभाग साल के 365 दिन अपनी जिम्मेदारी पूरी मुस्तैदी से निभाए, तो लोगों की सेहत बेहतर रह सकती है और अस्पतालों में इलाज पर होने वाला खर्च भी कम हो सकता है। लेकिन जब निगरानी की चर्चा त्योहारों से ठीक पहले तेज होती है और छापेमारी में हजारों किलो खाद्य सामग्री जब्त होने की खबर सामने आती है, तो सवाल उठना लाजिमी है—मिलावट बाजार तक पहुंच कैसे रही है और इसके लिए असल में जिम्मेदार कौन है?
उत्तर प्रदेश खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन (यूपीएफएसडीए) के ‘शुद्ध ही शुभ है’ अभियान के तहत प्रदेशव्यापी कार्रवाई में 20,924 किलोग्राम खाद्य सामग्री जब्त की गई। इसका अनुमानित मूल्य 66 लाख 87 हजार 58 रुपये बताया गया है। विभाग ने 176 नमूने लिए और मानव उपभोग के लिए अनुपयुक्त पाए गए 4,273 किलोग्राम खाद्य पदार्थ नष्ट कराए।
छापे में हजारों किलो, निगरानी पर सवाल
बरेली में 3,281 किलोग्राम घी, एटा में 2,544 किलोग्राम घी और मक्खन तथा लखनऊ में 748 किलोग्राम घी जब्त किया गया। नोएडा में 3,559 किलोग्राम पिसे मसालों की खेप पकड़ी गई। सहारनपुर में अस्वच्छ परिस्थितियों में रखी करीब 6,000 किलोग्राम हल्दी जब्त की गई। गाजियाबाद में मिथ्या छाप के आधार पर 2,848 किलोग्राम साबूदाना भी कार्रवाई के दायरे में आया।
ये आंकड़े विभागीय कार्रवाई का पैमाना जरूर बताते हैं, लेकिन साथ ही खाद्य पदार्थों के निर्माण, भंडारण और वितरण की निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। इतनी बड़ी खेपें क्या नियमित जांच के बावजूद बाजार तक पहुंचने की तैयारी में थीं? क्या जोखिम वाले कारोबारियों की पहले से पहचान की जा रही थी? इन सवालों का जवाब केवल छापेमारी की प्रेस विज्ञप्ति से नहीं मिलेगा।
घी के ब्रांड, भरोसे की परीक्षा
नमस्ते इंडिया और अविद जैसे घी ब्रांडों में मिलावट मिलने की बात भी सामने रखी जा रही है। हालांकि उपलब्ध विभागीय विवरण में इन दोनों ब्रांडों के नमूनों की प्रयोगशाला रिपोर्ट या उनके विरुद्ध की गई विशिष्ट कार्रवाई का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। इसलिए मिलावट की पुष्टि और जिम्मेदारी तय करने के लिए संबंधित नमूनों की आधिकारिक जांच रिपोर्ट जरूरी है।
यदि किसी ब्रांड के घी में मिलावट प्रमाणित होती है, तो मामला केवल उत्पाद की गुणवत्ता तक सीमित नहीं रहता। उपभोक्ता ब्रांड पर भरोसा करके खरीदारी करता है। ऐसे में सवाल उठता है कि गुणवत्ता नियंत्रण की जिम्मेदारी निभाने वाले निर्माता, वितरक और निगरानी तंत्र अपनी भूमिका कितनी प्रभावी ढंग से निभा रहे हैं।
असली गुनहगार कौन?
विभाग ने करीब 58 सुधारात्मक नोटिस जारी किए हैं। दो खाद्य कारोबारियों के लाइसेंस निलंबित करने की प्रक्रिया और बिना लाइसेंस कारोबार करने वाले एक प्रतिष्ठान के विरुद्ध वाद दायर करने की प्रक्रिया भी जारी बताई गई है। नोएडा के मामले में लाइसेंस निलंबन और एफआईआर से जुड़ी कार्रवाई की जानकारी दी गई है।
लेकिन नोटिस, जब्ती और नमूने लेना अंतिम परिणाम नहीं हैं। असली कसौटी यह है कि कितने नमूनों में मिलावट प्रमाणित हुई, कितने मामलों में दोषियों पर अंतिम कार्रवाई हुई और कितने कारोबारियों ने दोबारा नियम तोड़े। इन आंकड़ों की पारदर्शी जानकारी जनता तक पहुंचनी चाहिए।
मौसमी मिशन नहीं, सालभर की जिम्मेदारी
यूपीएफएसडीए आयुक्त डॉ. रोशन जैकब ने छोटे दुकानदारों और खुदरा विक्रेताओं का अनावश्यक उत्पीड़न न करने के निर्देश दिए हैं। यह संतुलन जरूरी है, लेकिन गंभीर उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कार्रवाई भी निष्पक्ष और निर्णायक होनी चाहिए।
खाद्य सुरक्षा व्यवस्था यदि नियमित निरीक्षण, समयबद्ध प्रयोगशाला जांच, जोखिम आधारित निगरानी और प्रभावी कानूनी कार्रवाई को अपनी दिनचर्या बनाए, तो मिलावट के अवसर कम किए जा सकते हैं। सुरक्षित भोजन लोगों की सेहत की रक्षा करता है और बीमारी के कारण होने वाले आर्थिक बोझ को घटाने में भी मदद करता है।
मिलावट की हर बड़ी खेप एक चेतावनी है। असली सफलता हजारों किलो खाद्य पदार्थ जब्त करने में नहीं, बल्कि उन्हें लोगों की थाली तक पहुंचने से रोकने में है। त्योहारों पर जागने वाली व्यवस्था अगर पूरे साल जागती रहे, तभी ‘शुद्ध ही शुभ है’ नारा नहीं, जनता का भरोसा बन सकेगा।




