चार साल से तैयार यूनानी हॉस्पिटल में ओपीडी तक शुरू नहीं, निदेशक की कार्यशैली पर उठे सवाल
रेली यूनानी कॉलेज पर संकट! लापरवाही से अल्पसंख्यक संस्थान के अस्तित्व पर खतरा

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Uttar Pradesh में यूनानी चिकित्सा पद्धति को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। बरेली में बने राजकीय यूनानी मेडिकल कॉलेज और हॉस्पिटल को लेकर यूनानी बिरादरी में भारी नाराजगी देखी जा रही है। आरोप है कि करोड़ों रुपये की लागत से तैयार संस्थान चार साल बाद भी पूरी तरह शुरू नहीं हो पाया, जबकि भवन दिसंबर 2025 में ही विभाग को हस्तांतरित किया जा चुका था।
आयुर्वेदिक तथा यूनानी तिब्बी चिकित्सा पद्धति बोर्ड के सदस्य Dr. Shakeel Ahmad ने खुला खत जारी कर यूनानी सेवाओं के निदेशक पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उनका आरोप है कि विभागीय अकर्मण्यता, फाइलों की धीमी प्रक्रिया और जिम्मेदार अधिकारियों की उदासीनता के कारण आज संस्थान बंदी जैसे हालात तक पहुंच गया है।
यूनानी संगठनों का कहना है कि अगर समय रहते ओपीडी और अस्पताल सेवाएं शुरू कर दी जातीं तो आज किसी दूसरे विभाग को भवन में शिफ्ट करने की चर्चा तक नहीं होती। आरोप यह भी है कि निदेशक स्तर पर फैसले टालने और लगातार देरी की वजह से सरकार की छवि भी कटघरे में खड़ी हो रही है।
बरेली का यह संस्थान प्रदेश का एकमात्र बड़ा अल्पसंख्यक यूनानी मेडिकल संस्थान माना जा रहा है, लेकिन हालात ऐसे बन गए हैं कि खुलने से पहले ही इसके भविष्य पर संकट मंडराने लगा है। यूनानी डॉक्टरों, छात्रों और सामाजिक संगठनों ने इसे “यूनानी बचाओ आंदोलन” का मुद्दा बताते हुए प्रदेशव्यापी अभियान की चेतावनी दी है।
डॉ. शकील अहमद ने मांग की है कि कॉलेज और अस्पताल को तुरंत शुरू किया जाए, ओपीडी चालू की जाए और भवन में किसी अन्य विभाग की शिफ्टिंग पर रोक लगे। साथ ही उन्होंने यूनानी विभाग की जवाबदेही तय करने की भी मांग उठाई है।
अब सवाल यह उठ रहा है कि आखिर करोड़ों की परियोजना समय पर शुरू क्यों नहीं हो सकी और क्या विभागीय लापरवाही की वजह से यूनानी चिकित्सा व्यवस्था को नुकसान पहुंच रहा है।



