शिक्षा

लखनऊ में फीस माफिया पर कड़ा प्रहार: डीएम विशाख जी का सख्त अल्टीमेट

ममनमानी फीस, कैपिटेशन चार्ज पर लगेगी लगाम—5 लाख जुर्माना और मान्यता रद्द तक की चेतावनी

निश्चय टाइम्स न्यूज डेस्क

Lucknow District Administration में जिलाधिकारी Vishakh G की अध्यक्षता में आयोजित जिला शुल्क नियामक समिति की बैठक ने निजी स्कूलों की मनमानी पर बड़ा प्रहार किया है। बैठक में साफ संदेश दिया गया कि अब फीस के नाम पर अभिभावकों का शोषण किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

जिलाधिकारी ने उत्तर प्रदेश स्ववित्तपोषित विद्यालय (शुल्क विनियमन) अधिनियम 2018 एवं संशोधन 2020 के प्रावधानों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि किसी भी विद्यालय को निर्धारित सीमा से अधिक शुल्क लेने की अनुमति नहीं है। यदि कोई संस्थान नियमों का उल्लंघन करता पाया गया, तो उस पर ₹5 लाख तक का भारी जुर्माना लगाया जाएगा, साथ ही उसकी मान्यता या एनओसी रद्द करने की भी कार्रवाई की जा सकती है।

बैठक में अभिभावकों की शिकायतों के त्वरित समाधान के लिए अपर जिलाधिकारी (नागरिक आपूर्ति) ज्योति गौतम और जिला विद्यालय निरीक्षक को नोडल अधिकारी नामित किया गया। इसके साथ ही एसडीएम, अपर नगर मजिस्ट्रेट और प्रधानाचार्यों की संयुक्त टीम गठित की गई है, जो क्षेत्रवार निरीक्षण कर रिपोर्ट प्रस्तुत करेगी।

डीएम ने सभी अधिकारियों को निर्देश दिए कि वे शिक्षा विभाग के साथ समन्वय बनाकर शिकायतों की निष्पक्ष जांच करें और समयबद्ध कार्रवाई सुनिश्चित करें। उन्होंने कहा कि हर विद्यालय अपनी वेबसाइट और नोटिस बोर्ड पर फीस का पूरा ब्योरा सार्वजनिक करेगा, ताकि पारदर्शिता बनी रहे।

सख्त निर्देश देते हुए कहा गया कि किसी भी छात्र को किताबें, यूनिफॉर्म, जूते या अन्य सामग्री किसी विशेष दुकान से खरीदने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा। यदि कोई विद्यालय ऐसा करता है, तो उसके खिलाफ कठोर दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी।

इसके अलावा, यूनिफॉर्म में लगातार पांच वर्षों तक कोई बदलाव नहीं किया जाएगा और जहां एनसीईआरटी पाठ्यक्रम लागू है, वहां केवल एनसीईआरटी की पुस्तकों से ही पढ़ाई कराना अनिवार्य होगा।

जिलाधिकारी ने स्पष्ट किया कि वर्तमान छात्रों की फीस वृद्धि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक और अधिकतम 5% अतिरिक्त शुल्क की सीमा के भीतर ही होगी। अभिभावक, छात्र या पीटीए सदस्य किसी भी अनियमितता की शिकायत सीधे नोडल अधिकारियों से कर सकते हैं।

यह बैठक शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता, जवाबदेही और अभिभावकों के हितों की रक्षा की दिशा में एक बड़ा और निर्णायक कदम मानी जा रही है।

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